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Jamtara News: आदिवासी संस्कृति की पहचान हैं ये पारंपरिक वाद्य यंत्र, सरकार दे रही है मुफ्त नगाड़ा और मांदर

जामताड़ा: आदिवासी समाज में ढोल, नगाड़ा, मांदर और करताल जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों का आज भी गहरा महत्व है। पूजा-पाठ, शादी-विवाह और विभिन्न पर्व-त्योहारों में आदिवासी समाज आज भी आधुनिक संगीत के बजाय अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों का ही उपयोग करता है। ये यंत्र केवल मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि उनकी प्राचीन संस्कृति और जड़ों से जुड़े हुए प्रतीक हैं।

🏹 संथाल परगना की पहचान: सोहराय और हूल दिवस पर गूंजती है मांदर की थाप

संथाल परगना में आदिवासी समाज की बड़ी आबादी बसती है। जामताड़ा के आदिवासी बहुल गांवों में सोहराय, कर्मा, हूल दिवस और सामाजिक समारोहों के अवसर पर इन पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज स्पष्ट सुनाई देती है। खास आयोजनों पर इन यंत्रों का उपयोग करना यहाँ की परंपरा का अनिवार्य हिस्सा माना जाता है, जो समुदाय को एक सूत्र में पिरोता है।

🙏 धार्मिक और सामाजिक प्रतीक: “वाद्य यंत्रों की आवाज से प्रसन्न होते हैं देवी-देवता”

आदिवासी संस्कृति के जानकार मनोरथ मरांडी बताते हैं कि मांदर, ढोल और नगाड़ा समाज का धार्मिक और सामाजिक प्रतीक हैं। प्रकृति की पूजा या ‘जाहेरथान’ में पूजा के दौरान इन यंत्रों को बजाने की सदियों पुरानी परंपरा है। समाज का मानना है कि पारंपरिक वाद्य यंत्रों की पवित्र आवाज से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

🎁 सरकार की खास पहल: पंचायतों में निशुल्क वाद्य यंत्रों का वितरण और संरक्षण

झारखंड सरकार ने इस समृद्ध संस्कृति को बचाए रखने के लिए एक सराहनीय पहल की है। प्रत्येक आदिवासी पंचायत में समारोह आयोजित कर मुफ्त में पारंपरिक वाद्य यंत्रों का वितरण किया जा रहा है। साथ ही, इनके संरक्षण के लिए हर पंचायत में ‘धूमकुड़िया भवन’ का निर्माण कराया गया है, जहाँ इन यंत्रों को सुरक्षित रखा जाता है ताकि आने वाली पीढ़ी भी इन्हें देख सके और इन्हें बजाना सीख सके।

📖 साहित्यकार का नजरिया: “पारंपरिक वाद्य यंत्रों के बिना अधूरा है आदिवासी जीवन”

राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार सुनील बास्की का कहना है कि पारंपरिक वाद्य यंत्र आदिवासियों के जीवन का एक अभिन्न अंग हैं। उनके अनुसार, ये यंत्र समाज के जीवन का हिस्सा हैं और इनके बिना उनकी सामाजिक संरचना अधूरी है। आज के आधुनिक दौर में जब बाजार डिजिटल संगीत से भरा है, तब भी आदिवासी समाज का अपनी परंपराओं और वाद्य यंत्रों के प्रति यह प्रेम उनकी अद्वितीय सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है।