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जबलपुर में स्वास्थ्य विभाग को मिली ऐतिहासिक सफलता, नई थेरेपी से एड्स पीड़ित माताओं के 13 बच्चे बने एचआईवी निगेटिव

जबलपुर (मध्य प्रदेश): एड्स (HIV/AIDS) एक अत्यंत गंभीर और जानलेवा बीमारी मानी जाती है। सामान्यतः यदि कोई गर्भवती महिला इस वायरस से पीड़ित होती है, तो गर्भस्थ शिशु या जन्म के समय नवजात में संक्रमण फैलने की प्रबल आशंका बनी रहती है।

तथापि, इस जानलेवा बीमारी के प्रसार को रोकने की दिशा में जबलपुर से एक अत्यंत राहतकारी और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। जबलपुर स्वास्थ्य विभाग के चिकित्सा विशेषज्ञों ने एड्स से पीड़ित माताओं के बच्चों को एचआईवी के प्रत्यक्ष संक्रमण से सुरक्षित बचाने में सफलता प्राप्त की है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का दावा है कि उन्होंने एक विशेष चिकित्सीय प्रक्रिया के माध्यम से 13 नवजात शिशुओं को ऐसा उपचार प्रदान किया है, जिससे उनमें एचआईवी का कोई भी वायरस नहीं पाया गया है।

💉 ‘एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी’ से तोड़ी गई एचआईवी संक्रमण की चेन, 15 में से 13 मामले रहे पूरी तरह सफल

जबलपुर स्वास्थ्य विभाग ने एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत यह महत्वपूर्ण उपलब्धि अर्जित की है।

आधुनिक एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी (ART) के सटीक और समयबद्ध प्रयोग के कारण इन मासूमों को जन्मजात बीमारी से बचाना संभव हो सका है। बीते 6 महीनों के भीतर जबलपुर में 15 गर्भवती महिलाएं एचआईवी पॉजिटिव पाई गई थीं। इनमें से 13 मामलों में समय पर चिकित्सीय हस्तक्षेप कर नवजात शिशुओं को पूरी तरह संक्रमण मुक्त रखा गया। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि यदि प्रोटोकॉल का कठोरता से पालन किया जाए, तो मां से बच्चे में वायरस के हस्तांतरण की चेन को पूरी तरह तोड़ा जा सकता है।

📊 जबलपुर में वर्ष 2005 से अब तक दर्ज हुए 2,668 एचआईवी मरीज, 2026 में 407 नए मामले आए सामने

जबलपुर जिला एड्स नियंत्रण विभाग के नोडल अधिकारी डॉ. संतोष ठाकुर ने जानकारी देते हुए बताया कि, “जबलपुर में एड्स जैसी गंभीर बीमारी के प्रभावी नियंत्रण हेतु निरंतर बहुआयामी अभियान संचालित किए जा रहे हैं।”

इसी क्रम में जनवरी 2026 से अब तक जिले में 7,260 संदिग्ध व्यक्तियों की रैपिड स्क्रीनिंग की गई, जिसमें 407 नए एचआईवी संक्रमित मरीज पाए गए। स्वास्थ्य विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2005 से लेकर अब तक जबलपुर जिले में कुल 2,668 एचआईवी पॉजिटिव मरीज पंजीकृत किए जा चुके हैं, जिन्हें निरंतर चिकित्सीय निगरानी में रखा जा रहा है।

👶 सिजेरियन के बजाय नॉर्मल डिलीवरी पर जोर, जन्म लेते ही शिशुओं को दी जाती है विशेष प्रिवेंटिव दवा

डॉ. संतोष ठाकुर का कहना है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के चलते एड्स अब पहले की भांति लाइलाज और भयावह नहीं रह गया है।

उन्होंने बताया कि यद्यपि शरीर से एचआईवी के वायरस को पूर्णतः समाप्त नहीं किया जा सकता, किंतु दवाओं के माध्यम से इसकी संख्या और प्रभावशीलता को न्यूनतम स्तर पर नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए एआरवी दवाओं का प्रयोग किया जाता है। उपचार की प्रथम प्राथमिकता यह होती है कि संक्रमित महिला के नवजात का जन्म शल्य क्रिया (सिजेरियन ऑपरेशन) से न होकर सामान्य रूप से हो, क्योंकि ऑपरेशन के दौरान रक्त संपर्क से संक्रमण का खतरा अधिक रहता है। इसके अतिरिक्त, जन्म के तुरंत बाद से ही बच्चे को विशेष निरोधात्मक दवाएं दी जाती हैं, ताकि वायरस पनप न सके।

🔬 प्रति 6 माह पर होती है बच्चों की जांच, निरंतर दवा से 25 वर्षों से सामान्य जीवन जी रहा है मरीज

संक्रमित माताओं से जन्मे बच्चों का एड्स कंट्रोल विभाग के कार्यकर्ताओं द्वारा हर 6 महीने में ब्लड टेस्ट किया जाता है और रिपोर्ट के आधार पर दवाओं की खुराक (Dose) निर्धारित की जाती है।

कई मामलों में बच्चों के जन्म के 2 वर्ष पूर्ण होने के उपरांत भी उनके शरीर में एचआईवी वायरस का कोई अंश नहीं पाया गया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि बच्चा पूरी तरह सुरक्षित है। डॉ. ठाकुर ने बताया कि सही समय पर नियमित दवा लेने से मरीज दीर्घायु प्राप्त कर सकता है। जबलपुर में एक ऐसा मरीज भी पंजीकृत है, जो पिछले 25 वर्षों से एचआईवी पॉजिटिव होने के बावजूद नियमित दवाइयों के बल पर सामान्य और स्वस्थ जीवन व्यतीत कर रहा है। वर्तमान में जिला अस्पताल, एल्गिन अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में ये दवाएं पूरी तरह निःशुल्क प्रदान की जा रही हैं।

🏥 12 अगस्त से शुरू होगा 10 दिवसीय विशेष अभियान, देह व्यापार अंचलों में मुफ्त मिलेगी दवा व परामर्श

जिले में एचआईवी संक्रमण की रोकथाम हेतु आगामी 12 अगस्त से 10 दिनों का विशेष सघन जांच व जागरूकता अभियान प्रारंभ किया जा रहा है।

इस अभियान के अंतर्गत जबलपुर के उन अति-संवेदनशील क्षेत्रों में प्राथमिकता के आधार पर शिविर लगाए जाएंगे, जहां देह व्यापार या हाई-रिस्क ग्रुप से जुड़े मामले सामने आते हैं। वहां आम नागरिकों और जोखिम वर्ग के लोगों को नि:संकोच एचआईवी टेस्ट कराने की समझाइश दी जाएगी। स्वास्थ्य विभाग ने स्पष्ट किया है कि एआरवी दवाएं पूरी तरह मुफ्त हैं और इनका कोई प्रतिकूल प्रभाव (Side Effect) नहीं होता है। नियमित दवा के सेवन से वायरस निष्क्रिय रहता है, जिससे मरीज को सामान्य जीवन जीने में कोई बाधा नहीं आती।