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UAPA केस में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 12 साल से बंद मोहम्मद साकिब और वकार अजहर को मिली जमानत

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत गिरफ्तार दो आरोपियों, मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अजहर को नियमित जमानत दे दी है।

अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि दोनों आरोपी लगभग 12 साल से लगातार जेल में बंद हैं और मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए ट्रायल के जल्द समाप्त होने की कोई संभावना नजर नहीं आती। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि इतने लंबे समय तक बिना ट्रायल पूरा हुए हिरासत में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक नागरिक को गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का गंभीर और स्पष्ट उल्लंघन है।

⚖️ दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला निरस्त, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनाया निर्णय

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा दर्ज मामले में सुनवाई करते हुए दोनों आरोपियों को तुरंत जमानत पर रिहा करने का आदेश जारी किया।

इस मामले में दोनों आरोपियों ने दिल्ली हाई कोर्ट के 24 अप्रैल, 2026 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें हाई कोर्ट ने UAPA की धारा 43D(5) के तहत उनकी जमानत याचिकाओं को खारिज करने वाले ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया था।

📊 197 गवाहों में से केवल 68 की हो सकी पूछताछ, जनवरी 2025 से अब तक केवल 2 गवाहों की गवाही

लीगल न्यूज पोर्टल ‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ई-कोर्ट पोर्टल पर उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड्स का संदर्भ देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस ट्रायल की प्रगति बेहद धीमी रही है।

अभियोजन पक्ष (Prosecution) ने अदालत के सामने 197 गवाहों की लंबी सूची पेश की है, लेकिन इतने वर्षों में अब तक केवल 68 गवाहों से ही पूछताछ की जा सकी है। कोर्ट ने चिंता व्यक्त करते हुए नोट किया कि जनवरी 2025 से अब तक महज दो गवाहों की ही परीक्षा ली गई है, जिनमें से भी एक की गवाही अभी तक अधूरी है।

⛓️ केस में कुल 25 आरोपी, राजस्थान के अन्य मामलों में पहले ही मिल चुकी है राहत

सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि इस बहुचर्चित मामले में कुल 25 आरोपी हैं और ट्रायल की वर्तमान गति को देखते हुए सुनवाई के शीघ्र पूरा होने का कोई आसार नहीं दिखता।

पीठ ने यह भी पाया कि दोनों आरोपी वर्ष 2014 से लगातार हिरासत में हैं। दिल्ली मामले के अतिरिक्त, राजस्थान में दर्ज दो अन्य आपराधिक मामलों में उन्हें या तो अदालत से जमानत मिल चुकी है अथवा उनकी सजा को निलंबित (Suspend) किया जा चुका है।

🕊️ सह-आरोपी को भी मिल चुकी है जमानत, लंबे समय तक हिरासत में रखना अनुचित: सुप्रीम कोर्ट

अदालत ने यह भी संज्ञान में लिया कि दिल्ली मामले के ही एक अन्य सह-आरोपी, मोहम्मद मारूफ को पहले ही जमानत प्रदान की जा चुकी है।

इन तमाम तथ्यों और परिस्थितियों का बारीकी से आकलन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आरोपियों को अनिश्चित काल के लिए जेल में बंद रखना किसी भी सूरत में न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। यह अनुच्छेद 21 के तहत उनके जीने और व्यक्तिगत आजादी के अधिकार का हनन है। इसके परिणामस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को दरकिनार करते हुए उन्हें जमानत पर रिहा करने का फैसला सुनाया।