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Ujjwal Nikam on Opposition Protest: उज्जवल निकम का विपक्ष पर बड़ा हमला, CEC के खिलाफ प्रदर्शन को बताया अराजकता और संविधान के लिए खतरा

इंदौर: देश के जाने-माने वरिष्ठ वकील, राज्यसभा सदस्य और पद्मश्री से सम्मानित उज्जवल निकम ने विपक्षी दलों के विरोध प्रदर्शन को पूरी तरह से अराजकता करार दिया है। इंदौर में अपनी फिल्म ‘प्रहार’ के प्रमोशन के सिलसिले में पहुँचे उज्जवल निकम ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को हटाने के लिए कानून का उल्लंघन करके आंदोलन करना बिल्कुल भी उचित नहीं है। यदि इस तरह का चलन देश में चल पड़ा, तो हर व्यक्ति अपनी मर्जी से ऐसी माँग करने लगेगा, जो देश के कानून और संविधान दोनों के लिए बेहद नुकसानदेह साबित होगा।

⚖️ ‘कानून के खिलाफ आंदोलन से राष्ट्रविरोधी ताकतों को मिलता है फायदा’

इंदौर के रवींद्र नाट्यगृह में ‘संस्था सार्थक’ द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘साहस, संकल्प और न्याय की एक प्रेरणादायी शाम’ के अवसर पर पत्रकारों और गणमान्य लोगों से चर्चा करते हुए उज्जवल निकम ने राहुल गांधी और विपक्षी दलों को कड़ी नसीहत दी। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की माँग के विरोध में बोलते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह की माँगे कानून के दायरे से बाहर जाकर करना पूरी तरह गलत है। इस प्रकार के उग्र आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों का फायदा देश की राष्ट्रविरोधी ताकतें उठा सकती हैं, इसलिए किसी भी राजनीतिक दल को ऐसी हरकतों से बचना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि यदि चुनाव आयोग जैसी प्रमुख संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ धरने-प्रदर्शन करके इस तरह की माँगे उठाई जाने लगीं, तो कल को कोई भी व्यक्ति किसी भी पद के लिए ऐसी माँग करने लगेगा, जिससे देश की कानून-व्यवस्था और संविधान नष्ट हो जाएगा। यदि किसी को भी संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा नहीं है, तो उसके समाधान के लिए देश में न्यायसंगत कानूनी रास्ते और व्यवस्थाएं पहले से मौजूद हैं।

⏳ फांसी की सजा के क्रियान्वयन और मर्सी पिटिशन पर टाइमलिमिट की मांग

इस दौरान जजों की टिप्पणियों पर अपनी राय रखते हुए उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों को भी गैर-जरूरी और एक्स्ट्रा कमेंट्स करने से बचना चाहिए, जब तक कि वह टिप्पणी उनके आधिकारिक जजमेंट (फैसले) का हिस्सा न हो, क्योंकि न्याय व्यवस्था पर जनता का विश्वास कायम रखने की जिम्मेदारी खुद न्यायपालिका से जुड़े लोगों की भी है।

मुस्कान और साहिल हत्याकांड मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे जघन्य मामलों में कानून पहले से ही काफी कठोर है, लेकिन दुर्भाग्य से फांसी की सजा के एग्जीक्यूशन (क्रियान्वयन) में 10-10 साल का लंबा समय लग जाता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि डेथ पेनल्टी और राष्ट्रपति के समक्ष दायर की जाने वाली मर्सी पिटिशन (दया याचिका) दोनों पर ही एक निश्चित समय-सीमा (टाइमलिमिट) तय होनी चाहिए।

🎬 ‘प्रहार द अनटोल्ड स्टोरी’ फिल्म का किया जिक्र

कार्यक्रम के अंत में उन्होंने मुंबई बम ब्लास्ट के मामलों और उसकी लंबी कानूनी सुनवाई पर बनी अपनी फिल्म ‘प्रहार द अनटोल्ड स्टोरी’ का भी विशेष जिक्र किया। उन्होंने बताया कि अभिनेता राजकुमार राव द्वारा अभिनीत इस फिल्म में मुंबई ब्लास्ट से जुड़े पूरे घटनाक्रम, कानूनी लड़ाइयों और उसमें पाकिस्तान की संलिप्तता को बहुत ही करीब से और सच्चाई के साथ पर्दे पर दिखाया गया है।