Kanha National Park Khairmata Temple: कान्हा के घने जंगलों में स्थित इस अनोखे मंदिर की कहानी, पिछले 35 साल से पूर्व वनकर्मी कर रहे हैं पूजा
बालाघाट: विश्व प्रसिद्ध कान्हा नेशनल पार्क के सूपखार वन परिक्षेत्र में घने जंगलों के बीच माता का एक बेहद प्राचीन और रहस्यमयी मंदिर बसा हुआ है, जहाँ शारदीय और चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर विशेष रूप से माता की पूजा-अर्चना की जाती है। चूंकि यह मंदिर कान्हा के संवेदनशील कोर जोन और घने जंगलों के बीच स्थित है, इसलिए यहाँ आम लोगों का आना-जाना पूरी तरह से प्रतिबंधित रहता है। हालांकि, नवरात्रि के इन दिनों में यहाँ माता के एक अनन्य भक्त का आगमन होता है, जो पहले इसी क्षेत्र में वनकर्मी के रूप में अपनी सेवाएं दिया करते थे। अब सरकारी सेवा से मुक्त होने के बाद भी वह हर साल नवरात्रि में यहाँ पहुँच जाते हैं और घने जंगलों के बीच माता की सेवा पिछले 35 सालों से पूरी निष्ठा के साथ करते आ रहे हैं।
🏚️ कान्हा की जद में आया था सूपखार गाँव, उजड़ने के बाद भी जिंदा है आस्था
प्राप्त जानकारी के अनुसार, कान्हा नेशनल पार्क के इस सूपखार वन परिक्षेत्र में कभी सूपखार नाम का एक भरा-पूरा गाँव हुआ करता था। इस गाँव में आदिवासी गोंड, परधान और पनका समाज के लोग बड़े प्रेम से निवास करते थे। वर्ष 1972 में जब कान्हा नेशनल पार्क का गठन और विस्तार किया गया, तब यह पूरा गाँव पार्क की सीमा के अंतर्गत आ गया, जिसके बाद सरकार द्वारा यहाँ के सभी निवासियों को अन्य स्थानों पर विस्थापित कर दिया गया।
इस तरह वर्षों पुराना यह गाँव पूरी तरह उजड़ गया और यहाँ रहने वाले लोग अलग-अलग जगहों पर जा बसे। समय के साथ खेतों और यहाँ बसने वाली जिंदगियों की तमाम निशानियां धीरे-धीरे मिट गईं, लेकिन माता का यह पवित्र मंदिर आज भी उस पुरानी बसाहट की यादों को अपने भीतर समेटे हुए शान से विद्यमान है। स्थानीय लोग इस स्थान पर स्थापित देवी को ‘खैरमाता’ के रूप में पूजते थे।
👤 रिटायर्ड वनकर्मी रामकृष्ण पिछले 35 साल से कर रहे हैं माँ की अनवरत सेवा
हर साल नवरात्रि के दिनों में माता की सेवा करने के लिए दुर्गम जंगलों के बीच अकेले पहुँचने वाले रिटायर्ड वनकर्मी रामकृष्ण बताते हैं कि उन्होंने यहाँ करीब 26 साल तक वन चौकीदार के रूप में अपनी सेवाएँ दी थीं। उस दौरान भी वे डयूटी के साथ-साथ माता की नियमित सेवा किया करते थे। उनका कहना है कि उनकी इस दरबार से अगाध और गहरी आस्था जुड़ी हुई है।
वे भले ही साल 2017 में सरकारी सेवा से पूरी तरह सेवानिवृत्त हो चुके हैं, लेकिन माता के प्रति उनका समर्पण आज भी पहले जैसा ही अटूट है। रामकृष्ण अब उम्र के इस पड़ाव पर वृद्ध हो चुके हैं, बावजूद इसके शारदीय और चैत्र दोनों ही नवरात्रियों के समय वे इस घने जंगल में अकेले पहुँच जाते हैं और लगातार 9 दिनों तक बिना किसी डर के माता के दरबार में विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं।
🐅 हिंसक जानवरों के बीच भी नहीं लगता कोई डर, भक्त मानते हैं माँ का चमत्कार
रामकृष्ण के अनुभव के अनुसार, इन घने और खतरनाक जंगलों के बीच अकेले रहकर माता की सेवा करने के दौरान उन्हें कभी भी किसी प्रकार का डर महसूस नहीं हुआ। वे बताते हैं कि अक्सर उनके आसपास से बाघ, तेंदुआ और अन्य कई हिंसक वन्यजीव गुजरते हैं, लेकिन आज तक किसी भी जानवर ने उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाया है। वे इस सुरक्षित अनुभव को पूरी तरह से माँ के चमत्कार और आशीर्वाद के रूप में देखते हैं।
चर्चा के दौरान उन्होंने यह भी साझा किया कि जब यह गाँव आबाद था, तब ग्रामीण अपने पूरे गाँव को प्राकृतिक संकटों से बचाने और क्षेत्र में सुख-शांति बनाए रखने के लिए इसी खैरमाता की आराधना किया करते थे। उस समय यदि गाँव में कोई अनहोनी घटना घटती थी, तो लोग उसे सीधे तौर पर माता के प्रकोप से जोड़कर देखते थे और माता को प्रसन्न करने के लिए विशेष अनुष्ठान करते थे।