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Inspirational Story: तबेले की मिट्टी से नेशनल वॉलीबॉल तक का सफर! खंडवा की श्रद्धा और ऋषिका की मिसाल

खंडवा। हरियाणा के महावीर फोगाट और उनकी बेटियों पर बनी ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘दंगल’ तो आप सभी को याद ही होगी, जिसमें एक पिता अपनी बेटियों के सपनों को पूरा करने के लिए खुद अखाड़ा तैयार करता है। मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के एक छोटे से गांव में भी कुछ ऐसी ही भावुक और प्रेरणादायक कहानी हकीकत बनकर सामने आई है।

यहां के एक साधारण किसान पिता जगदीश पटेल ने अपनी बेटियों श्रद्धा और ऋषिका के वॉलीबॉल खेलने के जुनून को पूरा करने के लिए अपने घर के बाड़े यानी मवेशियों के तबेले को ही एक शानदार वॉलीबॉल कोर्ट में बदल दिया।

🚴 रोज 10 किलोमीटर का कठिन सफर: थकान और मुश्किलों के बावजूद नहीं कम हुआ बेटियों का जुनून

गांव में खेल का मैदान करीब 10 किलोमीटर दूर होने के कारण दोनों बेटियों को रोज साइकिल से लंबा और थकाऊ सफर तय करना पड़ता था। श्रद्धा और ऋषिका के लिए वॉलीबॉल सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि उनके जीवन का सबसे बड़ा सपना था।

दोनों बहनें रोजाना कच्ची-पक्की सड़कों से होकर साइकिल चलाकर अभ्यास करने जाती थीं। शाम को घर लौटते समय अत्यधिक थकान के बावजूद खेल के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ। बेटियों की इस लगन और परेशानी को देखकर पिता का दिल पसीज गया।

🏆 तबेले की मिट्टी से स्टेट और नेशनल तक का सफर: पिता के त्याग और बेटियों की मेहनत ने रंग लाया

जहां कभी मवेशी बंधते थे और गोबर-कीचड़ रहता था, पिता की कड़ी मेहनत से उस जमीन पर बेटियों का पसीना बहने लगा। लगातार अभ्यास और पिता के अटूट भरोसे का नतीजा जल्द ही सामने आया।

बड़ी बेटी श्रद्धा ने अपनी प्रतिभा के बल पर नेशनल स्तर (National Level) तक का सफर तय किया, वहीं छोटी बेटी ऋषिका ने स्टेट लेवल (State Level) पर अपनी मजबूत पहचान बनाई। उनकी इस सफलता में उनकी व्यक्तिगत प्रतिभा के साथ-साथ पिता का त्याग और निरंतर प्रोत्साहन सबसे बड़ा आधार बना।

🌟 गांव के अन्य बच्चों की पाठशाला बना तबेला: अब श्रद्धा और ऋषिका दे रही हैं नि:शुल्क प्रशिक्षण

पिता द्वारा बाड़े में तैयार किया गया यह छोटा सा वॉलीबॉल कोर्ट अब सिर्फ दोनों बहनों तक ही सीमित नहीं रह गया है। श्रद्धा और ऋषिका अब अपने गांव के अन्य बच्चों और लड़कियों को भी वॉलीबॉल के गुर सिखा रही हैं।

किसान पिता का बनाया यह कोर्ट अब गांव के बच्चों के सपनों की एक नई पाठशाला बन चुका है। सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद जगदीश पटेल ने अपनी बेटियों के सपनों को पंख दिए।

💬 बेटियों की तकलीफ देख पिता ने उठाया कदम: ‘संसाधनों की कमी को आड़े नहीं आने दिया’

किसान पिता जगदीश पटेल ने अपनी इस पहल के बारे में बताते हुए कहा, “बेटियों को रोज 10 किलोमीटर दूर साइकिल से जाते और परेशान होते देखना मेरे लिए बहुत दुखद था। शहर में कमरा लेकर रहने या किसी बड़ी अकादमी की महंगी फीस जुटाने की मेरी स्थिति नहीं थी। ऐसे में मैंने ठाना कि संसाधनों की कमी को बेटियों के सपनों के बीच नहीं आने दूंगा। मैंने घर के पीछे मवेशियों के बाड़े की जमीन को खुद अपने हाथों से समतल किया, मिट्टी बिछाई और वॉलीबॉल का नेट लगाकर वहीं अभ्यास की व्यवस्था कर दी।”