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Guwahati High Court News: भारतीय नागरिकता साबित करने में फेल मजदूर, स्कूल सर्टिफिकेट से लेकर वोटर लिस्ट तक सब रिजेक्ट

असम में नागरिकता साबित करने का मामला फिर से सुर्खियों में है। गुवाहाटी हाई कोर्ट ने एक दिहाड़ी मजदूर की याचिका खारिज करते हुए उसे ‘विदेशी’ घोषित करने के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखा है। जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस शमीमा जहां की बेंच ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 के तहत खुद को भारतीय नागरिक साबित करने में विफल रहा।

📄 इन 15 सबूतों को कोर्ट ने नहीं माना पर्याप्त

याचिकाकर्ता ने अपनी नागरिकता के समर्थन में स्कूल सर्टिफिकेट, पैन कार्ड, वोटर आईडी (EPIC) और 1951 के एनआरसी (NRC) सहित कुल 15 दस्तावेज पेश किए थे। हालांकि, अदालत ने इन सभी को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ये दस्तावेज नागरिकता प्रमाणित करने के लिए कानूनी रूप से पर्याप्त नहीं हैं।

  • प्रमुख दस्तावेज: 1951 से 2015 तक की विभिन्न वर्षों की वोटर लिस्ट, दादा के नाम पर 1973 का भूमि खरीद विलेख, स्कूल सर्टिफिकेट, पैन कार्ड और एनआरसी की प्रतियां।

🚫 दस्तावेजों में विसंगति बनी आधार

कोर्ट ने अपने फैसले में तर्क दिया कि याचिकाकर्ता के विभिन्न दस्तावेजों में उसके पिता और परिवार के सदस्यों के नामों की स्पेलिंग और जन्मतिथि में भिन्नता है। कोर्ट ने कहा कि नागरिकता जैसे गंभीर मामले में मौखिक गवाही पर भरोसा नहीं किया जा सकता, यह पूरी तरह से ठोस रिकॉर्ड से साबित होना चाहिए। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि मामूली स्पेलिंग की गलतियां आम हैं और इन्हें नागरिकता खारिज करने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए, लेकिन अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

🏛️ क्या है कानून का रुख?

विदेशी अधिनियम की धारा 9 यह स्पष्ट करती है कि यदि किसी व्यक्ति पर विदेशी होने का आरोप है, तो यह साबित करने का भार (Burden of Proof) उसी व्यक्ति पर होता है कि वह भारतीय नागरिक है। याचिकाकर्ता का जन्म 1988 में असम में हुआ था और उसका परिवार वर्षों से वहां रह रहा है, लेकिन कानूनी दस्तावेजों में पाई गई कमियों के कारण वह अपनी नागरिकता का दावा साबित नहीं कर सका। यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी कानूनी चुनौती है जिनके पास लंबे समय से दस्तावेज तो हैं, लेकिन उनमें तकनीकी त्रुटियां मौजूद हैं।