ब्रेकिंग
चित्तौड़गढ़ में 'कातिल' मधुमक्खियों का तांडव! श्मशान में शव यात्रा पर किया हमला, दो की मौत; 50 लोगों... दिल्ली में गैस माफिया पर 'सर्जिकल स्ट्राइक'! 223 LPG सिलेंडर बरामद, पुलिस ने कालाबाजारी के बड़े खेल ... चीन और ईरान की 'खतरनाक' जुगलबंदी! अमेरिकी रिपोर्ट में बड़ा खुलासा—ड्रैगन दे रहा है तेहरान को घातक हथ... ईरान-इजरायल युद्ध के बीच भारत का 'प्लान-B' तैयार! गैस सप्लाई न रुके इसलिए खर्च होंगे ₹600 करोड़; क्य... Saharanpur Encounter: सहारनपुर में पुलिस मुठभेड़ में मारा गया इनामी अपराधी शहजाद, 44 वारदातों को दे ... Delhi Weather Update: दिल्ली में आंधी के बाद झमाझम बारिश, 20 मार्च तक खराब रहेगा मौसम; जानें अगले 3 ... Bihar Politics: बिहार में CM पद का दावेदार कौन? नीतीश कुमार की 'पहली पसंद' पर सस्पेंस, सम्राट चौधरी ... One Nation One Election: अब मानसून सत्र में आएगा 'महा-फैसला'! JPC की समय सीमा फिर बढ़ी; क्या 2027 मे... Noida Land Eviction: नोएडा में भू-माफिया के खिलाफ बड़ा एक्शन, जेवर एयरपोर्ट के पास 350 करोड़ की जमीन... Weather Update: दिल्ली-NCR, पंजाब और यूपी में अगले 3 दिन बारिश और ओलावृष्टि की चेतावनी, लुढ़केगा पार...

High Court Warning: संवैधानिक संस्थाओं में नियुक्तियों पर हाईकोर्ट सख्त, 4 साल की निष्क्रियता पर मांगा जवाब; सरकार की बढ़ी मुश्किलें

रांचीः झारखंड में संवैधानिक संस्थाओं में लंबे समय से खाली पड़े पदों को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है. चीफ जस्टिस एम एस सोनक और राजेश शंकर की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार पर नाराजगी जताई और स्पष्ट कहा कि चार वर्षों से अधिक समय तक संस्थाओं को निष्क्रिय रखना किसी भी सूरत में उचित नहीं है. झारखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता धीरज कुमार ने बताया कि मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजीव रंजन और प्रार्थी राजकुमार की ओर से अधिवक्ता वीपी सिंह ने पक्ष रखा.

खंडपीठ ने की सख्त टिप्पणी

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि संवैधानिक संस्थाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ होती हैं और उनमें अध्यक्ष व सदस्यों के पद खाली रहने से उनकी कार्यक्षमता पूरी तरह प्रभावित होती है. अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि सभी रिक्त पदों को जल्द से जल्द भरकर संस्थाओं को सक्रिय किया जाए. साथ ही चेतावनी दी गई कि यदि इसमें और देरी हुई तो अदालत कड़े आदेश पारित करने के लिए स्वतंत्र होगा.

अवमानना याचिका पर हुई सुनवाई

यह पहला मौका नहीं है जब हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर सख्ती दिखाई हो. इससे पहले भी अदालत ने राज्य सरकार को समयबद्ध तरीके से रिक्त पदों पर नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया था. नियुक्ति में अनावश्यक देरी पर नाराजगी जताते हुए जवाब-तलब किया था. कुछ मामलों में सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा था कि चयन प्रक्रिया क्यों लंबित है. संस्थाओं को निष्क्रिय न रहने देने के लिए अंतरिम उपाय अपनाने की सलाह भी दी थी. इसके बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं होने पर अब कोर्ट का रुख और सख्त हो गया है.

अदालत ने त्वरित कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया

दरअसल, लोकायुक्त, मानवाधिकार आयोग, मुख्य सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्त समेत अन्य संवैधानिक पदों पर नियुक्ति के संबंध में प्रार्थी राजकुमार की ओर से अवमानना याचिका दायर की गई. संवैधानिक संस्थाओं में लंबे समय तक रिक्तियां रहने से प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर असर पड़ता है. यही वजह है कि अदालत ने इसे गंभीर विषय मानते हुए त्वरित कार्रवाई की जरूरत पर जोर दिया.

अब इस मामले की अगली सुनवाई में यह देखना अहम होगा कि राज्य सरकार अदालत के निर्देशों का पालन करते हुए नियुक्ति प्रक्रिया को कितनी तेजी से आगे बढ़ाती है, या फिर हाईकोर्ट को वाकई सख्त कदम उठाने पड़ते हैं.