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सावन मास 2026 की शुरुआत 30 जुलाई से, जानिए क्यों निकाली जाती है कांवड़ यात्रा और क्या है इसका धार्मिक महत्व

रायपुर (छत्तीसगढ़): इस वर्ष 30 जुलाई से पवित्र सावन (श्रावण) महीने की शुरुआत हो रही है, जो 28 अगस्त 2026 तक चलेगा। इस पावन महीने में देशभर से लाखों-करोड़ों श्रद्धालु कठिन पैदल यात्रा (कांवड़ यात्रा) निकालकर देवाधिदेव महादेव का जलाभिषेक करते हैं।

आखिर सावन के महीने में ही कांवड़ यात्रा क्यों निकाली जाती है और सनातन धर्म में इसका क्या विशेष महत्व है? इस विषय पर प्रसिद्ध ज्योतिष एवं वास्तुविद पंडित प्रियाशरण त्रिपाठी ने विस्तार से शास्त्र सम्मत जानकारी दी है।

🌊 समुद्र मंथन और विषपान से जुड़ी है कांवड़ यात्रा की पौराणिक मान्यता

पंडित प्रियाशरण त्रिपाठी के अनुसार, पौराणिक काल में समुद्र मंथन के दौरान जब अत्यंत भयंकर विष (हलाहल) निकला, तो संपूर्ण सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उसे अपने कंठ में धारण कर लिया।

विष के तीव्र प्रभाव और जलन से महादेव का शरीर तपने लगा। तब ब्रह्मांड के सभी देवी-देवताओं ने भगवान शिव का निरंतर शीतल जल से जलाभिषेक किया, जिससे उन्हें विष की तपन से राहत और शीतलता प्राप्त हुई। इस पौराणिक घटना के बाद से ही भगवान शिव का पवित्र जल से अभिषेक करने की परंपरा आरंभ हुई।

🔱 भगवान शिव को जल क्यों चढ़ाया जाता है? भगवान परशुराम से जुड़ा है इतिहास

शास्त्रों के अनुसार, भोलेनाथ को शीतल जल अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान परशुराम भी भगवान शिव का नियमित रूप से जलाभिषेक किया करते थे।

समय के साथ यही भक्ति भाव ‘कांवड़ यात्रा’ के रूप में विकसित हुआ। इस परंपरा में श्रद्धालु गंगाजी, नर्मदाजी या अन्य पवित्र नदियों व तीर्थों से जल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करते हैं।

🚩 बैजनाथ धाम से शुरू हुई थी कांवड़ यात्रा, अब देश भर में फैली परंपरा

पंडित त्रिपाठी बताते हैं कि प्राचीन समय में देवघर स्थित प्रसिद्ध बैजनाथ धाम (वैद्यनाथ) में जलाभिषेक की परंपरा सबसे प्रमुख मानी जाती थी।

श्रद्धालु सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर नंगे पांव दूर-दूर से पैदल यात्रा कर भगवान बैजनाथ का अभिषेक करते थे। धीरे-धीरे समय के साथ यह परंपरा पूरे देश के प्रमुख शिव मंदिरों और ज्योतिर्लिंगों तक फैल गई और इसने एक विशाल कांवड़ यात्रा का रूप ले लिया।

🙏 कांवड़ यात्रा में क्या मांगी जाती है मनोकामना? ‘आशुतोष’ करते हैं कष्ट दूर

पंडित त्रिपाठी का कहना है कि भगवान शिव को ‘आशुतोष’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है जो अपने भक्तों के थोड़े से भाव और जल से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं।

उनके अनुसार, कांवड़ यात्रा केवल किसी सांसारिक मनोकामना की पूर्ति का माध्यम नहीं है, बल्कि यह अटूट श्रद्धा, कठिन तपस्या और निश्छल भक्ति का अनुपम प्रतीक है। जो भक्त सच्चे मन और पवित्रता से जल लाकर अर्पण करता है, उसके जीवन के तमाम दुख, दरिद्रता और कष्ट भगवान शिव स्वयं हर लेते हैं।

🌌 सावन में ही क्यों होता है विशेष शिव पूजन? जानिए श्रवण नक्षत्र का महत्व

पंडित त्रिपाठी बताते हैं कि श्रवण नक्षत्र से युक्त होने के कारण ही इस महीने को ‘श्रावण’ या सावन कहा जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन का महीना समस्त पापों, कष्टों और नवग्रह दोषों का निवारण करने वाला होता है। इसी अवधि में भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा (चातुर्मास) में चले जाते हैं, और इस दौरान सृष्टि के संचालन व संरक्षण का दायित्व स्वयं भगवान शिव के अधीन होता है। यही कारण है कि इस समय में शिव आराधना का फल कई गुना बढ़कर प्राप्त होता है।

💧 सावन में शिव जी के जलाभिषेक का फल और मनोकामना पूर्ति

सनातन मान्यता के अनुसार, सावन माह में भगवान शिव का विधि-विधान से जलाभिषेक व रुद्राभिषेक करने से घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।

भक्तों को आरोग्य का वरदान मिलता है और जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है। इसी अटूट आस्था के कारण हर वर्ष सावन में लाखों श्रद्धालु बम-बम भोले के जयकारों के साथ कांवड़ उठाकर शिव धामों की ओर प्रस्थान करते हैं।