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24 रुपये के लिए 5 साल की कानूनी लड़ाई: खाली बाम मिलने पर उपभोक्ता ने कंपनी को चखाया मजा, मिला 40 हजार का मुआवजा

रकम भले ही सिर्फ 24 रुपये की थी, लेकिन सवाल कस्टमर के अधिकार और न्याय का था। कानपुर निवासी सुधीन्द्र मिश्रा ने दो खाली बाम की डिब्बियों के मामले में करीब पांच साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी। आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें न्याय दिलाया।

क्या था पूरा मामला?

मामला अगस्त 2020 का है। पैर दर्द से राहत पाने के लिए सुधीन्द्र मिश्रा ने कानपुर के रावतपुर स्थित एक मेडिकल स्टोर से 12-12 रुपये की कीमत वाली ‘फास्ट रिलीफ पेन किलर बाम’ की दो डिब्बियां खरीदी थीं।

  • जब वह घर पहुंचे और पैकेट खोला, तो दोनों डिब्बियां पूरी तरह खाली थीं।

  • डिब्बियों में न तो बाम मौजूद था और न ही ढक्कन लगा हुआ था।

  • शिकायत करने पर दुकानदार ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि यह निर्माता कंपनी का मामला है और वह इसमें कुछ नहीं कर सकता।

कई बार शिकायत करने और समाधान की मांग करने के बावजूद, जब न तो उन्हें नई डिब्बियां दी गईं और न ही उनके 24 रुपये लौटाए गए, तब उन्होंने कानूनी रास्ता अपनाने का फैसला किया।

उपभोक्ता आयोग में दोनों पक्षों की दलीलें

जुलाई 2021 में सुधीन्द्र ने मेडिकल स्टोर संचालक और बाम बनाने वाली कंपनी के खिलाफ जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग में शिकायत दर्ज कराई। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपना बचाव कुछ इस तरह किया:

  • मेडिकल स्टोर की दलील: उनका काम केवल उत्पाद बेचना है, जबकि उत्पाद के निर्माण और पैकिंग की पूरी जिम्मेदारी कंपनी की होती है।

  • निर्माता कंपनी की दलील: यदि उत्पाद में कोई कमी थी, तो उपभोक्ता को सीधे उनके ‘क्वालिटी एश्योरेंस विभाग’ में शिकायत करनी चाहिए थी। शिकायत मिलने पर उचित कार्रवाई की जाती।

आयोग की सख्त टिप्पणी: आयोग ने इन दलीलों को अपर्याप्त मानते हुए कहा कि यदि किसी उपभोक्ता को दोषपूर्ण उत्पाद बेचा जाता है और उसकी शिकायत का समाधान नहीं किया जाता, तो यह सेवा में स्पष्ट कमी (Deficiency in Service) की श्रेणी में आता है। निर्माता कंपनी केवल यह तर्क देकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती कि शिकायत किसी अन्य विभाग में की जानी चाहिए थी।

40 हजार रुपये का मुआवजा देने का निर्देश

चूंकि मेडिकल स्टोर और कंपनी दोनों ही यह साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सके कि उपभोक्ता का दावा गलत था, इसलिए आयोग ने दोनों को जिम्मेदार ठहराया। आयोग ने अपने आदेश में निर्देश दिया:

  • मूल रकम की वापसी: सुधीन्द्र मिश्रा को बाम की कीमत 24 रुपये, मुकदमा दायर करने की तारीख से 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाई जाए।

  • भारी भरकम मुआवजा: मानसिक पीड़ा, समय की बर्बादी और मुकदमेबाजी में हुए खर्च की भरपाई के लिए 40,000 रुपये का मुआवजा दिया जाए।

यह फैसला एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि उपभोक्ता अधिकार केवल बड़ी रकम वाले मामलों तक सीमित नहीं हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहे और न्याय के लिए लगातार प्रयास करे, तो छोटी-सी शिकायत भी बड़ा फैसला दिला सकती है। साथ ही, यह निर्णय दुकानदारों और कंपनियों के लिए भी चेतावनी है कि ग्राहकों की शिकायतों को नजरअंदाज करना उन्हें बहुत महंगा पड़ सकता है।