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Giridih News: नक्सलवाद के काले साये से बाहर निकला पीरटांड़; अब CHC अस्पताल में रात को भी मिल रहा मरीजों को इलाज

गिरिडीह: झारखंड के गिरिडीह जिले के अंतर्गत आने वाले पीरटांड़ प्रखंड का जिक्र होते ही कभी लोगों के जेहन में नक्सलवाद, बंदूकों और दहशत की खौफनाक तस्वीर तैरने लगती थी। लेकिन आज समय बदल चुका है और पीरटांड़ विकास की एक नई इबारत लिख रहा है। यहाँ अब न सिर्फ उबड़-खाबड़ रास्तों की जगह चमचमाती सड़कों की सूरत बदली है, बल्कि सुदूरवर्ती गांवों तक बिजली भी पहुंच गई है। सबसे बड़ी और राहत की बात यह है कि यहां की चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था में पहले के मुकाबले अभूतपूर्व सुधार हुआ है। अतीत में जहां प्रखंड मुख्यालय में अवस्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) में किसी प्रकार की बुनियादी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं थी, डॉक्टर ड्यूटी पर रहते नहीं थे और शाम ढलने के बाद अस्पताल में सन्नाटा पसर जाता था और किसी का इलाज नहीं होता था, वहीं आज कई बड़े और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं।

पीरटांड़ के इस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में अब योग्य डॉक्टर चौबीसों घंटे तैनात रहते हैं। अस्पताल में अब मुफ्त रक्त जांच (Blood Test) समेत कई आधुनिक पैथोलॉजिकल सुविधाएं भी बढ़ाई गई हैं। अस्पताल आने वाले गरीब और जरूरतमंद मरीजों को प्रबंधन की तरफ से जरूरी दवाइयां भी मुफ्त मिल रही हैं। इसके अलावा, गर्भवती महिलाओं का यहां सुरक्षित प्रसव (डिलीवरी) करवाया जा रहा है। सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि अब मरीज उन सुदूरवर्ती और घने जंगली इलाकों से भी इलाज कराने अस्पताल पहुंच रहे हैं, जहां के आदिवासी और ग्रामीण लोग कभी सरकारी व्यवस्था पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं करते थे। इस स्वास्थ्य केंद्र में मिल रही जमीनी सुविधाओं का जायजा लेने के लिए मीडिया टीम ने वहां के चिकित्सा प्रभारी से खास बातचीत की।

🩺 अस्पताल में पर्याप्त मात्रा में दवाइयां और स्वास्थ्य कर्मी मुस्तैद: चिकित्सा प्रभारी डॉ. शशिकांत प्रसाद ने गिनाईं उपलब्धियां

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के चिकित्सा प्रभारी डॉ. शशिकांत प्रसाद ने अस्पताल के बदलते स्वरूप पर खुशी जाहिर करते हुए बताया कि पीरटांड़ सीएचसी में पहले की तुलना में सरकारी सुविधाएं काफी बढ़ी हैं। अब यहां आने वाले हर छोटे-बड़े मरीज का समय पर और उचित इलाज किया जा रहा है। प्रसव और जच्चा-बच्चा देखभाल के लिए भी ग्रामीण महिलाएं अब बिना किसी डर के दूर-दूर के गांवों से अस्पताल आ रही हैं।

उन्होंने बताया कि अस्पताल के फार्मेसी काउंटर पर मरीजों के लिए पर्याप्त मात्रा में जीवन रक्षक दवाइयां उपलब्ध हैं। इसके अलावा, सभी पैरामेडिकल कर्मी और नर्सें पूरी निष्ठा के साथ अपने काम में जुटे हुए हैं। अस्पताल में रक्त जांच की पूरी हाईटेक व्यवस्था बहाल की जा चुकी है। चिकित्सा प्रभारी ने यह भी साझा किया कि स्थानीय विधायक सुदिव्य कुमार, जो वर्तमान में राज्य सरकार में मंत्री भी हैं, वे खुद इस क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर काफी गंभीर हैं और अक्सर अस्पताल का औचक निरीक्षण (सरप्राइज चेकिंग) कर व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखते हैं।

🗣️ दहशत का दौर खत्म होने से बढ़ा सरकारी व्यवस्था पर भरोसा: ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने की हरलाडीह स्वास्थ्य केंद्र को भी दुरुस्त करने की मांग

प्रखंड के खरपोका गांव से इलाज कराने अस्पताल पहुंचे ग्रामीण असगर अली ने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा कि जब यहां नक्सली दहशत का दौर था, तो आम लोग सरकारी विभागों और अस्पतालों के पास जाने से भी डरते थे। लेकिन समय बदला और सरकार के प्रयासों से पहले गांवों को जोड़ने वाली पक्की सड़कें बनीं, जिससे आवागमन की सुविधा बढ़ी। सड़कें बनने से लोग अपने गांवों से बेखौफ होकर बाहर निकलने लगे, जिससे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति में भी बड़ा सुधार हुआ। अब यहां रात-बिरात भी चिकित्सक बैठते हैं और महिलाओं का सफल प्रसव होता है। उन्होंने प्रशासन से गुहार लगाई कि अगर अस्पताल में कुछ और विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति कर दी जाए, तो स्थानीय लोगों को और भी ज्यादा फायदा होगा।

दूसरी तरफ, भाजपा नेता श्याम प्रसाद ने भी माना कि पीरटांड़ मुख्यालय की स्वास्थ्य व्यवस्था में पहले से काफी सुधार हुआ है और अब चिकित्सक रात की पाली में भी मुस्तैद रहते हैं। हालांकि, उन्होंने क्षेत्र की अन्य कमियों को उजागर करते हुए कहा कि यहाँ डॉक्टरों के साथ-साथ लैब टेक्नीशियनों की संख्या तुरंत बढ़ाई जानी चाहिए। उन्होंने मांग की कि हरलाडीह में अवस्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को भी जल्द से जल्द दुरुस्त किया जाए। अगर हरलाडीह में हर रोज डॉक्टर रहने लगेंगे, तो सुदूरवर्ती पहाड़ी इलाके के ग्रामीणों को जिला मुख्यालय नहीं भागना पड़ेगा। उन्होंने एक मुख्य समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि वर्तमान में सीएचसी में प्राथमिक इलाज तो बढ़िया होता है, लेकिन यदि किसी मरीज की दुर्घटना में हड्डी टूट जाए (फ्रैक्चर), तो एक्स-रे और ऑर्थोपेडिक डॉक्टर न होने के कारण उन्हें मजबूरन 30 किलोमीटर दूर गिरिडीह रेफर करना पड़ता है। इस कमी को भी सरकार को जल्द दूर करना चाहिए।