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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: हत्या के मामले में दमोह कोर्ट से मिली उम्रकैद की सजा रद्द, 3 आरोपी दोषमुक्त

जबलपुर (मध्य प्रदेश): मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने दमोह जिला अदालत द्वारा हत्या के मामले में आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा से दंडित किए गए तीन आरोपियों को दोषमुक्त (बरी) कर दिया है।

प्रकरण के एक अन्य अभियुक्त ने सुनवाई के दौरान अपनी अपील वापस ले ली थी, जिसे न्यायालय से कोई राहत नहीं मिली है। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल एवं न्यायमूर्ति की युगलपीठ ने तीनों अपीलकर्ताओं की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उनके पक्ष में यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है।

⚖️ दमोह जिला अदालत के आजीवन कारावास के फैसले को हाईकोर्ट में दी गई थी चुनौती

दमोह जिला न्यायालय के सजा के आदेश के विरुद्ध अभियुक्त बसोरी अहिरवार, दशरथ अहिरवार, राजू अहिरवार और परसू उर्फ परशुराम अहिरवार की ओर से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अपील प्रस्तुत की गई थी।

अपील लंबित रहने के दौरान परशुराम की तरफ से 8 अप्रैल 2025 को याचिका वापस ले ली गई थी। इसके उपरांत युगलपीठ ने शेष तीन अपीलकर्ताओं की याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई की और अभियोजन पक्ष की कमियों को रेखांकित करते हुए तीनों को बरी करने का आदेश जारी किया।

🩸 वर्ष 2008 में हुआ था पैसों के लेनदेन को लेकर विवाद, पुलिस ने दर्ज किए थे केवल धारा 161 के बयान

मामले के विवरण के अनुसार, गोटीराम अहिरवार ईंट निर्माण का कार्य करते थे।

परसू ने ईंटें बनाने के लिए चित्तर सिंह से ₹4,000 की राशि ली थी, जिसकी गारंटी गोटीराम के भाई छिदामी ने ली थी। 31 मार्च 2008 को गोटीराम ने अपने पड़ोसियों—दशरथ अहिरवार, परसू अहिरवार, बसोरी अहिरवार और राजू अहिरवार से उक्त राशि लौटाने के संबंध में बात की। इस दौरान विवाद बढ़ने पर चारों ने गोटीराम पर कुल्हाड़ी और डंडों से प्राणघातक हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल गोटीराम को राजगढ़ थाने ले जाया गया, जहाँ पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर उपचार हेतु अस्पताल भेजा। पुलिस ने अस्पताल में घायल के सीआरपीसी की धारा 161 के तहत बयान दर्ज किए थे, किंतु विधिवत मृत्युपूर्व कथन (Dying Declaration) रिकॉर्ड नहीं कराया। 30 दिसंबर 2011 को दमोह सत्र अदालत ने चारों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

👁️ 50 फीट दूरी पर मौजूद लोगों को चश्मदीद गवाह मानना अनुचित: हाईकोर्ट युगलपीठ

अपील पर फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट युगलपीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा कि, “गोटीराम की चीख सुनकर घटनास्थल पर पहुंचने वाले व्यक्तियों को हत्या का प्रत्यक्षदर्शी (चश्मदीद गवाह) नहीं माना जा सकता, क्योंकि वे घटना के समय 50 से 60 फीट की दूरी पर थे। इसके अतिरिक्त, मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार जब घायल को अस्पताल लाया गया, तो डॉक्टर ने यह प्रमाणित नहीं किया कि मरीज पूर्णतः होश में और बयान देने की स्थिति में था। मरीज का रक्तचाप (BP) और हृदय गति भी रिकॉर्ड नहीं की गई थी, जबकि एमएलसी रिपोर्ट में मृत्युपूर्व कथन (Dying Declaration) दर्ज कराने की स्पष्ट सलाह दी गई थी।”

📜 डॉक्टर के प्रमाण-पत्र और डाइंग डिक्लेरेशन के बिना बयान संदिग्ध, जब्त हथियार भी कोर्ट में पेश नहीं

हाईकोर्ट ने कानूनी प्रावधानों को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि मृत्युपूर्व कथन तब दर्ज किया जाता है जब मरीज की स्थिति अत्यंत नाजुक हो।

वर्तमान मामले में इस बात पर गंभीर संदेह उत्पन्न होता है कि पीड़ित बयान देने की उचित मानसिक व शारीरिक स्थिति में था। पुलिस ने धारा 161 के तहत बयान दर्ज करने से पूर्व ड्यूटी डॉक्टर से कोई फिटनेस प्रमाण-पत्र प्राप्त नहीं किया था। इसके अलावा, पुलिस द्वारा आरोपियों के कब्जे से जब्त किए गए कथित हथियार (कुल्हाड़ी व डंडे) भी ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश नहीं किए गए थे। इन गंभीर प्रक्रियात्मक खामियों के आधार पर हाईकोर्ट ने तीनों आरोपियों को निर्दोष करार देते हुए बरी कर दिया।