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यूपी पंचायत चुनाव: ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की सुनवाई टली

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ग्राम प्रधानों को प्रशासक के तौर पर नियुक्त करने के फैसले के खिलाफ चल रहे मामले की सुनवाई टाल दी गई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट का कहना है कि लखनऊ बेंच की एक डिवीज़न बेंच पहले से ही इस मामले की सुनवाई कर रही है, इसलिए इस स्टेज पर हाई कोर्ट की सिंगल बेंच के सामने सुनवाई करना उचित नहीं है। न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने याचिका की सुनवाई को छह सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया है। यह मामला बलिया की राज कुमारी देवी और सहारनपुर के अरविंद राठौर द्वारा दायर याचिकाओं से जुड़ा है।

🚫 प्रशासक के तौर पर कार्य जारी रखने पर रोक

इससे पहले पिछली सुनवाई में, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि प्रधानों को प्रशासक के तौर पर काम जारी रखने की इजाजत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा था कि उन्हें प्रशासक नियुक्त करना डिवीज़न बेंच के पूर्व आदेश का उल्लंघन है और यह अदालत की अवमानना के समान है।

📜 पिछली सुनवाई और सरकारी आदेशों पर टिप्पणी

पिछली सुनवाई के दौरान, जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की अध्यक्षता वाली बेंच ने अरविंद राठौर की याचिका पर सुनवाई करते हुए 25 मई, 2026 और 26 मई, 2026 के उन सरकारी आदेशों को असंवैधानिक घोषित कर दिया था, जिनकी वजह से चुनाव टाल दिए गए थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये आदेश 1947 के एक्ट की धारा 12(3-A) के तहत जारी किए गए थे, जिसे हाई कोर्ट की डिवीज़न बेंच पहले ही ‘प्रमोद लाल पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में असंवैधानिक घोषित कर चुकी थी।

🏛️ पंचायत चुनाव और सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल

कोर्ट ने जोर दिया कि संविधान के आर्टिकल 243-E और 243-K के तहत पंचायतों का कार्यकाल पाँच वर्ष निर्धारित है और चुनाव समय पर होना अनिवार्य है। राज्य सरकार ने चुनाव में देरी का कारण ओबीसी कमीशन की रिपोर्ट का लंबित होना बताया था। कोर्ट ने इस पर हैरानी जताई कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद कमीशन ने रिपोर्ट क्यों नहीं सौंपी। वहीं, राज्य चुनाव आयोग ने जानकारी दी कि 10 जून, 2026 को वोटर लिस्ट जारी होने के बाद भी राज्य सरकार से जरूरी लॉजिस्टिक्स न मिलने के कारण चुनाव प्रक्रिया बाधित हो रही है।