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US-Iran Peace Deal: अमेरिका-ईरान समझौते से बदला मध्य पूर्व का समीकरण; नेतन्याहू और ट्रंप के बीच बढ़ी दूरियां

वैश्विक राजनीति: अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित 14 सूत्री समझौते ने मध्य पूर्व की राजनीति में हलचल मचा दी है। इस MoU पर हस्ताक्षर से महज 72 घंटे पहले इजराइल और अमेरिका के संबंधों में आई दरार साफ देखी जा सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ध्यान अब कूटनीतिक समझौते पर है, जबकि इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इसे अपने हितों के खिलाफ देख रहे हैं।

📉 नेतन्याहू और ट्रंप के रास्तों में दूरी

सोमवार रात नेतन्याहू ने पहली बार खुलकर कहा कि यह समझौता पूरी तरह से ‘अमेरिका का फैसला’ है। उन्होंने खुद को और अपने देश को इस निर्णय से अलग करते हुए साफ संकेत दिए कि इजराइल अब स्वतंत्र रुख अपना सकता है। नेतन्याहू इस समय विपक्षी दबाव, सेना (IDF/मोसाद) की नाराजगी और जनता के गुस्से के बीच ‘त्रिकोण’ में फंस गए हैं।

⚖️ कानूनी और राजनीतिक मुश्किलें

नेतन्याहू के लिए चुनौतियां केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि घरेलू मोर्चे पर भी हैं। यरूशलम की अदालत में भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी के मामलों की सुनवाई चल रही है। अदालत द्वारा उनके वकीलों की अर्जी खारिज करना यह दर्शाता है कि उनकी राजनीतिक पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं रही।

🛡️ ईरान का ‘प्रॉक्सी नेटवर्क’ और सुरक्षा चुनौतियां

ईरान के कुद्स फोर्स के कमांडर इस्माइल कानी का बयान कि ‘हमास का पुनर्निर्माण किया जाएगा’, इजराइल के लिए एक बड़ी चेतावनी है। समझौते के बाद ईरान पर लगे प्रतिबंध हटने की संभावना है, जिससे हमास और हिजबुल्लाह जैसे प्रॉक्सी संगठनों को फिर से हथियार मिलने का खतरा बढ़ गया है।

  • रूट-1: सड़क और समुद्र के जरिए 10-15 दिन में सप्लाई।

  • रूट-2: अरब सागर और सिनाई प्रायद्वीप के जरिए 2-3 महीने लंबी समुद्री और जमीनी यात्रा।

⏳ क्या होगा ‘ऑपरेशन प्रॉक्सी’?

अगर ईरान समझौते के बाद अपने नेटवर्क को फिर से खड़ा करने में सफल हो जाता है, तो यह इजराइल की सबसे बड़ी हार होगी। नेतन्याहू ने संकेत दिए हैं कि ईरान के खिलाफ लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है, और इजराइली सेना लेबनान और गाजा से पूरी तरह पीछे हटने के मूड में नहीं है। हेनरी किसिंजर के शब्द—”अमेरिका का कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, केवल उसके हित होते हैं”—आज के समय में बिल्कुल सटीक साबित हो रहे हैं।