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Supreme Court Alert: नाबालिग रेप पीड़िता मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त; स्वास्थ्य मंत्रालय को अवमानना नोटिस जारी, जानें पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को अवमानना नोटिस जारी किया. रेप पीड़िता नाबालिग लड़की का गर्भपात कराने के आदेश का अनुपालन ना कराने पर नोटिस जारी किया. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार तक जवाब तलब किया. जस्टिस नागरत्ना की बेंच ने एम्स में गर्भपात कराने का आदेश दिया था, जिसके संबंध में सीजेआई की बेंच के समक्ष आज मामला मेंशन किया गया था. सीजेआई ने हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया था.

बेंच ने कथित अवमानना मामले में – मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर के प्रिंसिपल सेक्रेटरी, डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर के सेक्रेटरी और AIIMS, नई दिल्ली के डायरेक्टर को सोमवार, 4 मई को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट में मौजूद रहने का निर्देश दिया. कोर्ट ने इशारा किया कि अगर तब तक ऑर्डर का पालन नहीं किया जाता है, तो वह चार्ज फ्रेम करने की कार्रवाई करेगा.

यह ऑर्डर नाबालिग लड़की की मां द्वारा फाइल की गई अवमानना याचिका में पास किया गया था. जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “अगर वे सोमवार तक हमारे ऑर्डर का पालन नहीं करते हैं, तो उन्हें कंटेम्प्ट प्रोसिडिंग में आगे के निर्देशों के लिए तैयार रहने दें. हमें किसी भी चीज़ से कोई मतलब नहीं है, सिवाय इसके कि इस कोर्ट के ऑर्डर का पालन किया जाए… अगर वे सोमवार तक इसका पालन नहीं करते हैं, तो हम चार्ज फ्रेम करेंगे. चार्ज फ्रेम करने से पहले हम उन्हें सुनेंगे.”

जानें क्या है पूरा मामला

यह कंटेम्प्ट प्ली कोर्ट के 24 अप्रैल के ऑर्डर से जुड़ी है, जिसमें नाबालिग की प्रेग्नेंसी को टर्मिनेट करने की इजाजत दी गई थी, जो सात महीने से ज्यादा हो चुकी थी. कोर्ट ने कहा था कि किसी महिला को सिर्फ इस आधार पर अनचाही प्रेग्नेंसी जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि बच्चे को जन्म के बाद गोद लेने के लिए दिया जा सकता है.

कोर्ट ने कहा कि प्रेग्नेंट महिला की पसंद सबसे ऊपर रहनी चाहिए. कोर्ट ने कहा था कि किसी महिला, खासकर नाबालिग को, प्रेग्नेंसी को पूरे समय तक रखने का निर्देश देना, उसे गंभीर मेंटल, इमोशनल और फिजिकल ट्रॉमा देगा, और संविधान के आर्टिकल 21 के तहत उसके फंडामेंटल राइट का उल्लंघन करेगा. कोर्ट ने कहा कि अनचाही प्रेग्नेंसी को जारी रखने के लिए मजबूर करना प्रेग्नेंट महिला की भलाई को खत्म कर देगा और इसे पैदा होने वाले बच्चे के अधीन कर देगा.

कोर्ट, नाबालिग की मां की उस याचिका पर विचार कर रहा था, जिसमें मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के तहत कानूनी लिमिट से ज्यादा समय तक गर्भपात की इजाजत मांगी गई थी.

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कही ये बात

यूनियन ऑफ इंडिया ने याचिका का विरोध किया था, जिसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि इतने एडवांस स्टेज में गर्भपात से मां और बच्चे दोनों की जान को खतरा होता है और सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी के ज़रिए गोद लेने का सुझाव दिया गया था. उन्होंने फाइनेंशियल मदद की भी पेशकश की.

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने नाबालिग लड़की की इच्छा जानने के लिए उसकी काउंसलिंग की रिक्वेस्ट की थी. हालांकि, कोर्ट ने इस तरीके को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि अगर कोई महिला प्रेग्नेंसी जारी रखने को तैयार नहीं है, तो कोर्ट उसे फाइनेंशियल मदद या गोद लेने पर निर्भर रहने के लिए नहीं कह सकता.

कोर्ट ने कहा कि प्रेग्नेंसी दो नाबालिगों के बीच सहमति से बने रिश्ते से हुई थी और लड़की ने साफ तौर पर इसे जारी रखने की अपनी अनिच्छा जताई थी. कोर्ट ने मेडिकल सुरक्षा उपायों के तहत, नई दिल्ली के AIIMS में गर्भपात की इजाज़त दी। इसके बाद, AIIMS ने एक रिव्यू पिटीशन के जरिए आदेश को चुनौती दी, जिसे उसी बेंच ने खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि यह “अजीब” है कि AIIMS सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने को तैयार नहीं था और इसके बजाय नाबालिग के संवैधानिक अधिकारों को हराने की कोशिश कर रहा था.

कोर्ट ने जताई नाराजगी

इसके बाद AIIMS ने एक क्यूरेटिव पिटीशन दायर की, जिसका जिक्र आज सुबह चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच के सामने किया गया. कोर्ट ने क्यूरेटिव पिटीशन पर विचार करने से इनकार कर दिया और दोहराया कि AIIMS महिला पर अपना फैसला नहीं थोप सकता.

कोर्ट ने कहा कि महिला को सोच-समझकर फैसला लेने की इजाजत दी जानी चाहिए. ASG ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि भ्रूण 30 हफ्ते का था और जिंदा था, और गर्भपात से नाबालिग को ऐसा नुकसान हो सकता है जिसे ठीक नहीं किया जा सकता.

उन्होंने जन्म का इंतजार करने और बच्चे को गोद देने का सुझाव दिया. हालांकि, कोर्ट ने कहा कि अनचाही प्रेग्नेंसी किसी महिला पर जबरदस्ती नहीं थोपी जा सकती. जस्टिस बागची ने कहा कि सभी मेडिकल बातों की जानकारी मिलने के बाद लड़की और उसके परिवार को फैसला करना है, न कि AIIMS को यह तय करना है. कोर्ट ने AIIMS के डॉक्टरों को लड़की की काउंसलिंग करने और मेडिकल रिपोर्ट शेयर करने की इजाजत दी, लेकिन इंस्टीट्यूशन को अपनी बात रखने के लिए कोर्ट में वापस आने की इजाजत नहीं दी. इसी बैकग्राउंड में मौजूदा कंटेम्प्ट की कार्रवाई शुरू की गई है.