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Bokaro News: बोकारो में श्रद्धा और उल्लास से मन रहा ‘भगता पर्व’, जानें इस खास त्योहार की पूजा विधि और पूरी महत्ता

बोकारो: झारखंड में भगता पर्व राढ़ संस्कृति का एक अभिन्न अंग है. अमूमन 12 अप्रैल से इस पर्व को मनाने का सिलसिला प्रारंभ होता है और लगभग एक महीने तक अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग दिनों में इसे मनाने का प्रचलन है. इसे चड़क पूजा, शिव पूजा, मंडा पर्व, विशु पर्व जैसे नामों से भी जाना जाता है. वैसे तो यह मूलतः आदिवासियों और कुड़मी समुदाय का पर्व है, पर कालांतर में सदानों के बीच भी यह समान रूप से प्रचलित हुआ है और दोनों समुदाय उसी उत्साह, उमंग और श्रद्धा से मनाते हैं.

बोकारो जिला में भी दर्जनों जगहों पर भगता पर्व धूमधाम से मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. जिले के कसमार प्रखंड का ऐतिहासिक सिंहपुर शिवालय भी उनमें एक है. यहां 12 से 15 अप्रैल तक यह पर्व मनाया जाता है.

कुड़मियों के लिए भी भगता पर्व का विशेष महत्व

भगता पर्व को लेकर कई तरह की मान्यताएं स्थापित हैं. कुड़मी समुदाय के लोग इसे सामूहिक मरखी उठी घाट कमान के रूप में मनाते हैं. कुड़मियों के अनुसार, यह कुड़मियों के बारह मासे तरह पर्व के अंतर्गत मनाए जाने वाला एक प्रमुख पर्व है. उनके अनुसार, यह मूलतः मड़ा और भुगैता पर्व है, जिसे अपभ्रंश कर मंडा और भगता अथवा भोक्ता पर्व कर दिया गया है. कुड़माली संस्कृति के जानकार व शोधकर्ता दीपक पुनुरिआर और सुरेश बानूआर के अनुसार, कुड़मियों का मानना है कि उन्हें भूखंड से लेकर सब कुछ अपने पुरखों से प्राप्त हुआ है. पुरखों से प्राप्त चीजों का उपयोग करने वालों को ही भुगैता कहा जाता है. वही भुगैता अथवा भगतिया इस पर्व के रूप में अपने तमाम पुरखों को याद करते हैं और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.

इनका मानना है कि किसी की मृत्यु होने पर जिस प्रकार 10 दिनों तक रहन-सहन, खान-पान आदि का पालन किया जाता है, ठीक उसी प्रकार इस पर्व में भी 10 दिनों तक रहन-सहन, खान-पान समेत तमाम चीजों का पालन होता है. जिस तरह अग्निमुखी केवल सफेद गमछा या धोती पहनते हैं और हाथों में लोहे का बेंत रखते हैं, इस पर्व में भी ठीक उसी तरह सफेद गमछा या धोती पहने और बेंत रखने का प्रचलन है. जिस तरह सभी जनजातीय संस्कृति में जागर (दीपक) जलाने की परंपरा है, ठीक उसी तरह इस पर्व में भी मड़प थान में जागर (दीपक) जलाकर उसे छेदा हाड़ी में रखा जाता है. उसके बाद सांड़दगाई होती है. इसमें नए भगतिया को जोड़ने की रस्म निभाई जाती है. पुनुरिआर के अनुसार, इस पर्व के अन्य सभी रस्म भी उसी तरह सामूहिक मरखी उठी घाट कमान से जुड़ी हैं. यही कारण है कि इस पर्व के दौरान ‘बूढ़ा बाबा’ के जयकारे लगाए जाते हैं.

सनातन धर्मावलंबियों के अनुसार शिव महोत्सव है भगता पर्व

दूसरी ओर, सनातन धर्मावलंबियों के अनुसार यह शिव महोत्सव है और इसमें भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है. कहा जाता है कि आदिकाल में बाणासुर नामक एक असुर शिव का परम भक्त हुआ करता था. उसने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था. उस दौरान बाणासुर ने अपनी नाक, कान, जीभ आदि काटकर भगवान शिव को अर्पित कर दिया था. इस कठोर उपासना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने बाणासुर को मनचाहा वरदान दिया था. कहा जाता है कि उसी समय से यह परंपरा शुरू हुई है और भगता पर्व के रूप में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्तिया कठोर उपासना करते हैं. उसी के तहत लोहे की कील से पीठ को छिदवाने और उसी के सहारे 50 फुट की ऊंचाई पर झूलने जैसी रस्में निभाई जाती हैं.

कसमार के सिंहपुर में उमड़ता है जनसैलाब

कसमार प्रखंड में कई जगहों पर भगता पर्व मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. उनमें सिंहपुर के प्राचीन शिवालय में मनाया जाने वाला यह पर्व विशेष उल्लेखनीय है. यहां जनसैलाब उमड़ता है. लोक मान्यताओं के अनुसार सिंहपुर शिवालय में स्थापित शिवलिंग की उत्पत्ति 18वीं सदी में सिंहपुर के एक महतो परिवार में दही की हांडी में हुई थी. नुना ओझा नामक पुजारी ने इसकी पहचान शिवलिंग के रूप में की थी. उसके बाद खैराचातर-सिंहपुर के तत्कालीन राजा बाबू जगन्नाथ सिंहदेव ने ग्रामीणों के आग्रह पर गांव में शिवलिंग की स्थापना की. थोड़े समय बाद मंदिर का निर्माण भी हुआ. शिवलिंग की स्थापना के अलावा 18वीं सदी में ही मंडा पर्व शुरू कराने में भी जगन्नाथ सिंहदेव की अहम भूमिका थी. आज भी उनके वंशज इस पर्व के कई रस्मों से जुड़े हुए हैं. पर्व के दौरान जगन्नाथ सिंहदेव एवं उनके पूर्वजों के जयकारे भी लगते हैं.

सभी समुदायों की रहती है भागीदारी

सिंहपुर में इस पर्व में सभी जाति-समुदायों की भागीदारी रहती है. जगन्नाथ सिंहदेव ने अपनी उच्च स्तरीय सामाजिक सोच के तहत गांव के प्रायः सभी जाति-समुदायों को अलग-अलग जागीरदारी अथवा जिम्मेदारियां सौंपकर इस पर्व के बहाने समाज को एक सूत्र में बांधने का भी काम किया था. ऐसा दावा है कि जगन्नाथ सिंहदेव अथवा उनके पूर्वजों का संबंध पंचकोट (काशीपुर) राजघराना से रहा है.

संजोत के साथ होती है पर्व की शुरुआत

सिंहपुर के मंडा पर्व में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ा है. 12 अप्रैल को संजोत के साथ ही श्रद्धालुओं की भीड़ यहां जुटने लगती है. झारखंड के विभिन्न जिलों के अलावा सीमावर्ती पश्चिम बंगाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं. सैकड़ों श्रद्धालु मीलों दूर से दंडवत करते शिवालय तक पहुंचते हैं. 12 की शाम को लोटन सेवा में एक हजार से अधिक भक्तिया शामिल होते हैं. इसे देखने भी लोग उमड़ पड़ते हैं.

मंडा पर्व में सखुआ पेड़ और गुलंज फूल विशेष महत्व

इस पर्व में सखुआ पेड़ और गुलंज के फूल का खास महत्व है. इस संबंध में फुलसुसारी मनोज सिंह ने बताते हैं कि सखुआ पेड़ का खूंटा, पाट आदि साल भर तालाब में डूबाकर रखा जाता है. पर्व के समय इसे तालाब से खोजकर बाहर निकालते हैं. उसी खूंटा पर भगता का झूलन होता है. मालूम हो कि सखुआ लकड़ी की यह विशेषता है कि वह पानी में सड़ती-गलती नहीं है और अधिक टिकाऊ होती है. इसी तरह गुलंज फूल का उपयोग सभी श्रद्धालु और भगतिया अनिवार्य रूप से करते आये हैं.