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महामंडलेश्वर बनने के लिए सिर मुंडवाना क्यों है जरूरी, क्या है महत्व?

प्रयागराज महाकुंभ में किन्नर अखाड़े के संस्थापक ऋषि अजय दास ने अभिनेत्री ममता कुलकर्णी को महामंडलेश्वर पद से हटा दिया है. इसके पीछे उनके सिर न मुंडवाने की वजह सामने आई है. मान्यता है कि महामंडलेश्वर बनने के लिए व्यक्ति को सन्यासी जीवन अपनाना होता है. सन्यासी जीवन में सांसारिक सुखों का त्याग किया जाता है और साधना पर ध्यान केंद्रित किया जाता है. सिर मुंडवाना इस त्याग का प्रतीक माना जाता है. सिर मुंडवाने से सभी साधु-संत एक समान दिखते हैं. इससे जाति, धर्म या समाजिक स्थिति के आधार पर भेदभाव खत्म होता है. सिर मुंडवाने से मन शांत होता है और ध्यान में एकाग्रता बढ़ती है. इसलिए महामंडलेश्वर बनने के लिए सिर मुंडवाना आवश्यक होता है.

किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर बनने के लिए कुछ दिनों पहले ममता कुलकर्णी ने प्रयागराज महाकुंभ में अपना पिंडदान किया था और संन्यास अपना लिया था. इसके बाद भव्य पट्टाभिषेक कार्यक्रम में उन्हें किन्नर अखाड़े का महामंडलेश्वर बनाया गया था. उनका नया नाम श्री यामाई ममता नंद गिरी रखा गया था. लेकिन उनके सिर न मुंडवाने को लेकर जमकर विरोध हुआ.

महामंडलेश्वर बनने की परंपरा

ऐसी मान्यता है कि महामंडलेश्वर को धर्म शास्त्रों का गहन ज्ञान होना चाहिए और उसे साधना में निपुण होना चाहिए. उसे समाज सेवा के लिए समर्पित होना चाहिए. उसे किसी अखाड़े से जुड़ा होना चाहिए. महामंडलेश्वर बनने और किसी आखाड़े से जुड़ने के लिए सिर मुंडवाना जरूरी होता है. किन्नर अखाड़े के लोगों का मानना है कि पट्टाभिषेक के दौरान मुंडन कराने की परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है. फिर इस परंपरा को क्यों नहीं निभाया गया. जबकि पिंडदान के बाद मुंडन संस्कार आवश्यक होता है. यानि बिना सिर मुंडवाए व्यक्ति पवित्र कैसे हो सकता है.

मुंडन का ये खास महत्व

पिंडदान और मुंडन दोनों ही हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण संस्कार हैं. ये दोनों संस्कार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और इनके माध्यम से व्यक्ति आध्यात्मिक विकास करता है. मान्यता है कि पिंडदान करने से लोगों को सांसारिक दुनिया से मुक्ति मिलती है. मुंडन संस्कार से भी मोक्ष प्राप्ति का मार्ग खुलता है. माना जाता है कि मुंडन करने से व्यक्ति सांसारिक बंधनों से मुक्त होता है और नए जीवन की शुरुआत करता है.

ऐसा माना जाता है कि मुंडन के माध्यम से व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से शुद्ध होता है. इससे व्यक्ति के अंदर एक नई ऊर्जा का संचार होता है. पिंडदान के बाद मुंडन करने से जीवन में एक नई शुरुआत का संकेत मिलता है. दोनों ही संस्कार आध्यात्मिक विकास से जुड़े हुए हैं. प्रयागराज में पिंडदान और मुंडन का विशेष महत्व है. यहां गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है. यहां पिंडदान करने और मुंडन करने से व्यक्ति पवित्र हो जाता है.