Bilaspur High Court Verdict: तलाक के मामलों में नैसर्गिक न्याय का पालन जरूरी, बिना सुनवाई के आदेश अवैध- हाईकोर्ट
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी मामले में दूसरे पक्ष को सुने बिना या उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना एकतरफा निर्णय नहीं दिया जा सकता। जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की खंडपीठ ने तलाक के एक मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि कानून के मुताबिक अखबार में नोटिस प्रकाशित करवाना हमेशा अंतिम विकल्प होता है, और उससे पहले सामान्य तरीके से नोटिस तामील कराने व घर पर चस्पा करने की अनिवार्य प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए।
📄 क्या था पूरा मामला: सूरजपुर निवासी महिला को नहीं थी तलाक की कार्यवाही की जानकारी
सूरजपुर की रहने वाली महिला के पति ने 9 जनवरी 2024 को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की थी। कोर्ट द्वारा रजिस्टर्ड डाक से भेजा गया नोटिस गलत पते के कारण वापस लौट आया था, जिसके बाद पति के अनुरोध पर फैमिली कोर्ट ने स्थानीय अखबार में नोटिस प्रकाशित कराने की अनुमति दे दी और 29 फरवरी 2024 को अखबार में प्रकाशन हो गया। महिला का कहना था कि उसे इस पूरी कानूनी प्रक्रिया की कोई जानकारी नहीं थी। बाद में 18 नवंबर 2024 को औरंगाबाद में चल रहे भरण-पोषण के मामले की काउंसलिंग के दौरान उसे एकतरफा तलाक की डिक्री की जानकारी मिली, जिसके बाद उसने दिसंबर 2024 में डिक्री रद्द करने की अर्जी लगाई थी।
🏛️ हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता का हवाला देकर फैमिली कोर्ट का आदेश किया खारिज: अब नए सिरे से होगी सुनवाई
माननीय हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 5 के नियम 17 और 20 का हवाला देते हुए पाया कि फैमिली कोर्ट ने केवल एक बार डाक से नोटिस वापस लौटने पर बिना घर पर नोटिस चस्पा किए सीधे अखबार में प्रकाशन का आदेश दे दिया, जो कानूनी रूप से सही नहीं था। हाईकोर्ट ने महिला की देरी को माफ करते हुए फैमिली कोर्ट के 23 जून 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें महिला की याचिका खारिज कर दी गई थी। अब फैमिली कोर्ट इस एकतरफा तलाक की डिक्री को रद्द करने की मांग वाली अर्जी पर नए सिरे से सुनवाई करेगा और इसके लिए दोनों पक्षों को आगामी 12 अक्टूबर को कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया गया है।