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Maskara Ganesh Festival: मराठा राजवंश के इतिहास से जुड़ी है यह अनूठी परंपरा, पितृ पक्ष में होती है गणपति की स्थापना

सनातन धर्म में गणेश उत्सव समाप्त होने के बाद प्रतिमाओं का विसर्जन कर दिया जाता है और उसके बाद आने वाले 15 दिनों के पितृ पक्ष में कोई भी नया या शुभ कार्य करने की मनाही होती है। इस दौरान केवल पितरों के तर्पण और पूजा-अर्चना का विधान है। लेकिन मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा शहर और उसके आसपास के कई ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ नर्मदापुरम के इटारसी में एक बेहद अनूठी परंपरा निभाई जाती है, जहाँ पितृ पक्ष के दौरान ही गणेश पंडाल सजते हैं और भगवान गणेश की स्थापना की जाती है, जिन्हें ‘मस्कारा गणेश’ कहा जाता है।

📜 नागपुर के भोसले राजवंश से जुड़ी है शुरुआत: बंगाल विजय के बाद शुरू हुआ था यह अनोखा उत्सव

मराठा समाज के जिला अध्यक्ष प्रवीण काटकर के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 1787 में नागपुर के भोसले राजवंश के श्रीमंत राजे खंडोजी महाराज भोसले (चिमणाबापू) ने की थी। जब चिमणाबापू बंगाल पर विजय प्राप्त करके नागपुर लौटे, तब तक पारंपरिक गणेशोत्सव समाप्त हो चुका था और कुल के गणपति का विसर्जन भी हो चुका था। अपनी सेना और प्रजा के साथ बंगाल विजय का उत्सव मनाने के लिए उन्होंने पितृ पक्ष के दौरान दोबारा गणपति की स्थापना की थी। चूंकि मराठी भाषा में ‘मस्कारा’ का अर्थ मजाक या मनोरंजन करना होता है, इसलिए इस दौरान सांस्कृतिक और मनोरंजक गतिविधियां आयोजित होने के कारण इन्हें मस्कारा गणेश कहा जाने लगा।

🏛️ छिंदवाड़ा और इटारसी में निभाई जा रही है दशकों पुरानी परंपरा: पितृ पक्ष की अमावस्या पर होता है विसर्जन

मस्कारा गणेश को मन्नत वाले गणेश भी कहा जाता है। छिंदवाड़ा के चंदनगांव में जय बाबा बर्फानी गणेश समिति द्वारा साल 1980 से इस परंपरा को निभाया जा रहा है, और सौंसर, पांढुर्णा व चौरई के महंगोरा में भी यह सिलसिला जारी है। वहीं, नर्मदापुरम के इटारसी में भी रेलवे स्टेशन के पास स्थित दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर परिसर में गौर परिवार पिछले 80 से 90 वर्षों से इस परंपरा का निर्वहन कर रहा है। जानकारों का मानना है कि दोष, नियम और पंचक आदि केवल मानव जीवन के लिए होते हैं, भगवान और देवताओं के लिए पूजा-अर्चना कभी वर्जित नहीं होती। पितृ पक्ष की समाप्ति यानी अमावस्या के दिन विधि-विधान से इन गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है।