Jharkhand Tribal Politics: पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून को ध्यान में रखकर हो परिसीमन, राज्यपाल से गुहार
रांची। झारखंड में आगामी प्रस्तावित परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज का विरोध और चिंताएं लगातार गहराती जा रही हैं। इस संवेदनशील मुद्दे पर लगातार मुखरता से आवाज उठा रहे विभिन्न आदिवासी संगठनों से जुड़े एक संयुक्त शिष्टमंडल ने राजभवन (लोकभवन) का रुख किया। राज्य के पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर अपनी गहरी चिंताएं जाहिर करते हुए प्रतिनिधियों ने राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार से मुलाकात की और उन्हें एक मांग पत्र (ज्ञापन) सौंपा। पूर्व मंत्री बंधु तिर्की के नेतृत्व में पहुंचे इस प्रतिनिधिमंडल में कई प्रमुख आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे।
📜 परिसीमन में सिर्फ जनसंख्या को आधार न बनाने की मांग: संवैधानिक भावना के सम्मान का आग्रह
राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार को ज्ञापन सौंपते हुए शिष्टमंडल ने विशेष रूप से यह आग्रह किया कि परिसीमन की प्रक्रिया में केवल जनसंख्या (पॉपुलेशन) को ही एकमात्र आधार न बनाया जाए।
प्रतिनिधियों ने पांचवीं अनुसूची की मूल संवैधानिक भावना और आदिवासी अधिकारों को ध्यान में रखने का अनुरोध किया। इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने परिसीमन से जुड़ी अपनी तमाम आशंकाओं और आदिवासी समाज के अस्तित्व से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों से राज्यपाल को अवगत कराया। हालांकि अभी परिसीमन को लेकर कोई आधिकारिक अधिसूचना (नोटिफिकेशन) जारी नहीं हुई है, लेकिन संभावित बदलावों को लेकर आदिवासी संगठनों में अभी से गहरा असंतोष है।
🎙️ राज्यपाल को जमीनी हकीकत और आशंकाओं से कराया अवगत: पूर्व मंत्री बंधु तिर्की
राजभवन के बाहर मीडिया से बातचीत करते हुए पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज के मन में जो डर और आशंकाएं हैं, उनसे राज्यपाल को विस्तार से अवगत कराया गया है।
इसके साथ ही आदिवासियों से जुड़े कई अन्य अहम विषयों पर भी गहन चर्चा हुई। इसमें राज्य के डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) में आ रहे बदलाव, ट्राइबल सब-प्लान, सीएनटी (CNT) एक्ट और पेसा (PESA) कानून जैसे गंभीर मुद्दे शामिल हैं।
⚠️ जनसंख्या के साथ पलायन और विस्थापन पर ध्यान देना जरूरी: सांसदों और दलों से करेंगे बात
बंधु तिर्की ने कहा कि हमने राज्यपाल के समक्ष दो प्रमुख पहलू रखे हैं— पहला संवैधानिक व्यवस्था और दूसरा जमीनी धरातल की स्थिति।
उन्होंने कहा कि राज्य में आदिवासियों की संख्या में कमी, बड़े पैमाने पर पलायन और विस्थापन जैसे कारकों ने जनसांख्यिकी को प्रभावित किया है। यदि परिसीमन में केवल आबादी को आधार बनाया गया और राज्य सरकार ने इन संवेदनशील पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया, तो भविष्य में आदिवासियों के राजनीतिक और सामाजिक प्रतिनिधित्व के लिए बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर वे जल्द ही मुख्यमंत्री, राज्य के सांसदों और सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से भी मुलाकात करेंगे।
🚨 समय रहते ठोस कदम उठाने की आवश्यकता: सामाजिक कार्यकर्ता वासवी किड़ो
इस अवसर पर वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता वासवी किड़ो ने कहा कि परिसीमन के भावी परिणामों को लेकर आज पूरा आदिवासी समुदाय बेहद चिंतित है।
उन्होंने कहा कि राज्यपाल ने भी इस विषय की गंभीरता को समझा है। यदि समय रहते सभी राजनीतिक दलों और जिम्मेदार संस्थाओं ने इस दिशा में सकारात्मक कदम नहीं उठाए, तो आने वाले दिनों में राज्य में गंभीर सामाजिक और राजनीतिक संकट खड़ा हो सकता है। मुलाकात के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने पांचवीं अनुसूची, जनसांख्यिकीय बदलावों और कानूनी प्रावधानों पर अपना स्पष्ट रुख राज्यपाल के समक्ष रखा।