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विश्व हाथी दिवस पर कॉर्बेट लैंडस्केप से अच्छी खबर के साथ चिंता भी, हाथियों की संख्या बढ़कर हुई 1,226

रामनगर (उत्तराखंड): आज संपूर्ण विश्व में ‘विश्व हाथी दिवस’ (World Elephant Day) मनाया जा रहा है। प्रतिवर्ष 12 अगस्त को मनाया जाने वाला यह दिन हाथियों के समग्र संरक्षण, उनके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा तथा सदियों पुराने पारंपरिक आवागमन मार्गों (एलिफेंट कॉरिडोर) को अक्षुण्ण रखने के संकल्प का प्रतीक है। उत्तराखंड का ‘कॉर्बेट लैंडस्केप’ भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण हाथी प्राकृतिक आवासों में गिना जाता है। वन्यजीव संस्थान (WII) की अद्यतन रिपोर्ट के अनुसार, संपूर्ण उत्तराखंड में लगभग 1,792 जंगली हाथी स्वच्छंद विचरण कर रहे हैं, जिनमें से केवल कॉर्बेट क्षेत्र में इनकी संख्या बढ़कर 1,226 दर्ज की गई है। यद्यपि हाथियों की संख्या में वृद्धि संरक्षण की दृष्टि से सुखद समाचार है, किंतु सिकुड़ते वन क्षेत्र, अनियंत्रित मानवीय दबाव, राजमार्गों का विस्तार और बाधित होते माइग्रेशन रूट हाथियों के अस्तित्व के समक्ष नई चुनौतियां उत्पन्न कर रहे हैं।

🐘 कोमल घास की कमी और लेंटाना (कूरी) का प्रकोप, क्यों बदल रहे हैं हाथी अपने पारंपरिक रास्ते?

प्रसिद्ध वन्यजीव फोटोग्राफर दीप रजवार के अनुसार, कॉर्बेट लैंडस्केप के कई ऐसे वन क्षेत्र हैं जहाँ पूर्व में हाथियों के विशाल झुंड नियमित रूप से दिखाई देते थे, किंतु अब उनकी आवाजाही के पैटर्न में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है।

पर्यटन गतिविधियों के विस्तार, जंगलों के बीच से गुजरने वाली सड़कों पर अनियंत्रित ट्रैफिक और रात्रिकालीन शोर-शराबे ने हाथियों के प्राकृतिक व्यवहार को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है। हाथी एक अत्यंत संवेदनशील और बुद्धिमान वन्यजीव है; जब उसके पारंपरिक गलियारों में मानवीय हस्तक्षेप बढ़ता है या भोजन की कमी होती है, तो वह टकराव से बचने के लिए अपने मार्ग और समय में परिवर्तन कर लेता है। इसके साथ ही, जंगलों में आक्रामक खरपतवार ‘लेंटाना’ (कूरी) के तेजी से फैलने के कारण हाथियों के मुख्य भोजन—प्राकृतिक घास के मैदान—नष्ट हो रहे हैं, जो एक गंभीर चिंता का विषय है।

🚧 आबादी विस्तार और कंक्रीट के निर्माण से कटे एलिफेंट कॉरिडोर, गोला रिवर व सीताबनी क्षेत्र प्रभावित

वरिष्ठ वन्यजीव विशेषज्ञ संजय छिम्वाल का कहना है कि तराई-भाबर अंचल में बढ़ती मानव आबादी और कंक्रीट निर्माण गतिविधियों का सीधा असर हाथियों के ऐतिहासिक माइग्रेशन रूट्स पर पड़ा है।

यमुना नदी से लेकर नेपाल सीमा तक फैले हाथियों के कई पारंपरिक गलियारे आज संकीर्ण या पूरी तरह बाधित हो चुके हैं। काठगोदाम के समीप स्थित ‘गोला रिवर कॉरिडोर’ इसका ज्वलंत उदाहरण है। इसी प्रकार, वन्यजीव प्रेमी हिमांशु तिरुवा बताते हैं कि सीताबनी क्षेत्र में जहाँ ग्रीष्मकाल में हाथियों के बड़े-बड़े झुंड डेरा डालते थे, अब वहाँ उनकी उपस्थिति में भारी कमी दर्ज की गई है। अव्यवस्थित बुनियादी ढांचा विकास और सड़कों के चौड़ीकरण के कारण यदि समय रहते इन प्राकृतिक गलियारों को सुरक्षित नहीं किया गया, तो हाथी इंसानी बस्तियों की ओर रुख करने को विवश होंगे, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष और अधिक भीषण रूप ले सकता है।

🌿 पारिस्थितिकी तंत्र के रक्षक हैं हाथी, वन संरक्षण से जोड़कर देखना आवश्यक

पर्यावरण एवं वन्यजीव प्रेमी गणेश रावत का मानना है कि हाथी केवल एक विशालकाय वन्यजीव नहीं हैं, बल्कि वे पूरे जंगल के ‘इकोसिस्टम इंजीनियर’ और पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ हैं।

जंगलों में हाथियों की निरंतर आवाजाही से वनस्पतियों के बीजों का प्राकृतिक फैलाव होता है, जिससे घने जंगलों का संतुलन बना रहता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि उत्तराखंड की वैश्विक पहचान केवल बाघों से ही नहीं, बल्कि हाथियों सहित इसकी समृद्ध जैव विविधता से है। अतः हाथियों के संरक्षण को पृथक रूप से न देखकर व्यापक वन और पर्यावरण संरक्षण नीति के अभिन्न अंग के रूप में देखा जाना चाहिए।

📋 शिवालिक एलिफेंट रिजर्व का हिस्सा है पूरा कॉर्बेट, निदेशक डॉ. साकेत बडोला ने बताया ऐक्शन प्लान

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (CTR) के निदेशक डॉ. साकेत बडोला ने बताया कि कॉर्बेट सहित यह पूरा वनांचल ‘शिवालिक एलिफेंट रिजर्व’ का महत्वपूर्ण भाग है, जो हाथियों के बहुत बड़े भौगोलिक परिदृश्य से जुड़ा हुआ है।

डॉ. बडोला के अनुसार, हाथियों के कॉरिडोर को चिन्हित करने और उनके पुनरुद्धार हेतु वैज्ञानिक स्तर पर कार्य जारी है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (WTI) के सहयोग से एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की गई है, जिसमें अलग-थलग पड़ चुके संवेदनशील गलियारों की पहचान की गई है। वर्तमान में वन विभाग WTI के साथ मिलकर ट्रैकिंग और ड्रोन सर्वे कर रहा है, ताकि विकास और वन्यजीव संरक्षण के मध्य आदर्श संतुलन स्थापित किया जा सके और गजराज के ये ऐतिहासिक गलियारे सर्वदा खुले रहें।