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बस्तर दशहरा 2026: 7 किमी बैलगाड़ी खींचकर दंतेश्वरी मंदिर लाई गई साल की लकड़ी, 12 अगस्त को निभाई जाएगी पहली ‘पाठजात्रा’ रस्म

बस्तर (छत्तीसगढ़): छत्तीसगढ़ के बस्तर का 75 दिनों तक चलने वाला विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व अपनी अनूठी और ऐतिहासिक परंपराओं के लिए दुनिया भर में विख्यात है। रविवार को इस ऐतिहासिक पर्व की पहली रस्म के लिए बिल्लोरी गांव से करीब 7 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए बैलगाड़ी को खींचकर जंगल से पवित्र लकड़ी लाई गई और आराध्य देवी मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर में पहुंचाया गया। वर्षों के लंबे अंतराल के बाद बस्तर के ग्रामीणों ने इस प्राचीन परंपरा को पुनर्जीवित करते हुए निभाया। 7 किलोमीटर तक बैलगाड़ी खींचकर लाने के दौरान स्थानीय युवाओं में भारी उत्साह देखा गया, जो रास्ते भर बस्तर की कुलदेवी मां दंतेश्वरी के जयकारे लगाते हुए मंदिर प्रांगण पहुंचे।

🪵 जानिए क्या है ‘ठुरलू खोटला’, जिससे निभाई जाती है दशहरा की पहली पाठजात्रा रस्म

बस्तर दशहरा की परंपराओं पर प्रकाश डालते हुए कोटवार संतो कश्यप ने बताया कि बस्तर दशहरा की पहली ‘पाठजात्रा’ रस्म के लिए बिल्लोरी गांव से लकड़ी लाने का विशेष दायित्व उनके पूर्वजों (दादा-परदादा) को सौंपा गया था।

उसी परंपरा का निर्वहन करते हुए रविवार को बिल्लोरी के भाटीगुड़ा से बैलगाड़ी के जरिए लकड़ी खींचकर लाई गई है, जिसे स्थानीय परंपरा में ‘ठुरलू खोटला’ कहा जाता है। इसी ठुरलू खोटला लकड़ी का उपयोग कर हरियाली अमावस्या/पर्व के अवसर पर बस्तर दशहरा की प्रथम आधिकारिक रस्म निष्पादित की जाती है।

📐 साल की लकड़ी से निर्मित होता है ‘ठुरलू खोटला’, 12 अगस्त को अदा की जाएगी पाठजात्रा रस्म

‘ठुरलू खोटला’ वास्तव में साल (सखुआ) के वृक्ष का एक विशेष एवं सुदृढ़ तना होता है।

इसकी लंबाई लगभग 6 फीट होती है तथा इसकी मोटाई बाहों के आकार की होती है। इस पवित्र लकड़ी का प्रयोग विशालकाय दशहरा रथ के निर्माण एवं उससे जुड़े परंपरागत औजार बनाने में किया जाता है। इसी ठुरलू खोटला की पूजा-अर्चना के साथ दशहरा पर्व की ‘पाठजात्रा’ रस्म अदा की जाती है। इस वर्ष यह महत्वपूर्ण एवं पावन रस्म 12 अगस्त को मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर में विधिवत आयोजित की जाएगी।

🐐 विशाल रथ के ‘पाटा’ भी पहुंचे, बलि परंपरा को लेकर समिति से की गई मांग

संतो कश्यप ने आगे जानकारी देते हुए बताया कि ठुरलू खोटला के साथ-साथ बस्तर दशहरा में चलने वाले बड़े रथ में लगने वाले लकड़ी के ‘पाटा’ भी लाए गए हैं।

उल्लेखनीय है कि 8 पहियों वाले विशाल रथ में 4 पाटा तथा 4 पहियों वाले रथ में 2 पाटा उपयोग में लाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि प्राचीन मान्यताओं के अनुसार इस रस्म एवं जात्रा के सफल आयोजन हेतु पूर्व में बकरे की बलि दिए जाने की परंपरा रही है। इस वर्ष भी ग्रामीणों द्वारा आयोजन समिति से पारंपरिक बकरे की मांग की गई है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि उनकी यह मांग पूरी होती है, तो संपूर्ण ग्रामीण समाज में हर्ष व्याप्त रहेगा।