झारखंड परिसीमन विवाद: क्या घटेगी आदिवासियों की राजनीतिक हिस्सेदारी? जानें 2007 के इतिहास से लेकर JMM व कांग्रेस की मांगें
रांची (झारखंड): देश में आगामी वर्षों में प्रस्तावित परिसीमन (Delimitation) की सुगबुगाहट के साथ ही झारखंड में राजनीतिक व सामाजिक हलचल तेज हो गई है। राज्य के विभिन्न आदिवासी संगठनों एवं जनजातीय समुदाय के बुद्धिजीवियों के मध्य परिसीमन का मुद्दा एक बार फिर जोर पकड़ रहा है। आने वाले दिनों में यह विषय झारखंड की राजनीति के केंद्र बिंदु में रहने की पूरी संभावना है। राज्य के जनजातीय समाज को यह गहरा डर सता रहा है कि यदि केवल जनसंख्या को आधार बनाकर परिसीमन किया गया, तो अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित लोकसभा व विधानसभा सीटों की संख्या घट सकती है, जिससे उनकी राजनीतिक भागीदारी प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होगी। इसी विरोध स्वरूप विभिन्न आदिवासी संगठनों ने आगामी 30 अगस्त को राजधानी रांची में एक विशाल ‘महाजुटान रैली’ का औपचारिक ऐलान कर दिया है।
⚠️ जनसंख्या आधार बना तो घटेंगी ST आरक्षित सीटें, आदिवासी बहुल क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व होगा कमजोर
झारखंड के प्रमुख जनांदोलनकारियों में शामिल दयामनी बारला का कहना है कि, “भारतीय जनता पार्टी (BJP) चुनावी लाभ हेतु मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और परिसीमन के माध्यम से रणनीति बना रही है।”
उनका मानना है कि यदि 2026 के बाद जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन लागू होता है, तो राज्य की 81 विधानसभा और 14 लोकसभा सीटों में से जनजातीय समाज के लिए आरक्षित सीटों में भारी कटौती हो सकती है। इससे आदिवासी बहुल अंचलों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व काफी कमजोर हो जाएगा।
🏙️ शहरीकरण और पलायन से घटा एसटी आबादी का अनुपात, पूर्व मेयर रमा खलखो ने व्यक्त की चिंता
रांची की पूर्व मेयर एवं महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रमा खलखो तथा सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों का कहना है कि राज्य गठन के बाद से झारखंड में तीव्र गति से हुए शहरीकरण, रोजगार हेतु पलायन और गैर-आदिवासी जनसंख्या के आगमन से कई पारंपरिक क्षेत्रों में जनजातीय आबादी का प्रतिशत कम दर्ज हुआ है।
संविधान के तहत आरक्षित सीटों का निर्धारण उस क्षेत्र की संबंधित एसटी आबादी के अनुपात पर निर्भर करता है। ऐसे में यदि परिसीमन में सिर्फ आबादी का गणित देखा गया, तो कई मौजूदा एसटी आरक्षित सीटें सामान्य (General) श्रेणी में परिवर्तित हो जाएंगी, जिससे जनजातीय नेतृत्व की आवाज दब जाएगी।
📚 क्या है परिसीमन का अर्थ और 2026 तक क्यों स्थगित था इसका क्रियान्वयन?
परिसीमन का तात्पर्य जनसंख्या के नए आंकड़ों के आधार पर लोकसभा एवं विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन करना है ताकि प्रत्येक क्षेत्र में मतदाताओं का अनुपात संतुलित रहे। यह प्रक्रिया ‘परिसीमन आयोग’ द्वारा संपन्न कराई जाती है।
उल्लेखनीय है कि देश में लोकसभा और विधानसभा सीटों की कुल संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर पहले 2001 तक और तत्पश्चात संविधान के 84वें संशोधन द्वारा वर्ष 2026 तक फ्रीज (स्थगित) कर दिया गया था। इस अवधि में केवल सीमाओं का समायोजन ही अनुमत था।
📜 2007 में UPA सरकार ने क्यों रद्द कर दिया था झारखंड का परिसीमन आदेश?
वर्ष 2007 में परिसीमन आयोग ने झारखंड के लिए एक आदेश जारी किया था, जिसमें 81 विधानसभा सीटों में से एसटी आरक्षित सीटों को 28 से घटाकर 22 और एससी सीटों को 10 करने का प्रस्ताव रखा गया था।
तत्कालीन समय में इसका भारी जनाक्रोश और विरोध हुआ था। जनभावनाओं को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने पुनर्विचार किया और वर्ष 2009 में संसद में कानून बनाकर 2007 के परिसीमन आदेश को निष्प्रभावी (Non-est) घोषित कर दिया था। इसके बाद राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के तहत पुरानी व्यवस्था (28 एसटी और 9 एससी आरक्षित सीटें) ही लागू रखी गई।
🔥 “आरक्षित सीटें घटीं तो राज्य में होगा ‘उगलुलान'”: झामुमो (JMM) की खुली चेतावनी
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के केंद्रीय प्रवक्ता मनोज पांडेय ने दोटूक शब्दों में कहा कि, “परिसीमन के नाम पर यदि झारखंड के जनजातीय समाज की सीटें घटाने का प्रयास हुआ, तो पूरे राज्य में व्यापक ‘उलगुलान’ (आंदोलन) होगा।”
उन्होंने कहा कि यदि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन बाध्यकारी है, तो संसद में संविधान संशोधन कर आदिवासी बहुल राज्यों को छूट दी जानी चाहिए। JMM किसी भी परिस्थिति में जनजातीय अधिकारों में कटौती स्वीकार नहीं करेगी।
🛡️ 5वीं अनुसूची और विशेष संवैधानिक दर्जे के संरक्षण की मांग
झारखंड के आदिवासी संगठनों, JMM और कांग्रेस की संयुक्त मांग है कि परिसीमन केवल आबादी के गणितीय आंकड़ों पर आधारित न होकर राज्य के विशेष संवैधानिक दर्जे, पांचवीं अनुसूची (5th Schedule), अनुसूचित क्षेत्रों और आदिवासी अस्मिता की सुरक्षा को प्राथमिकता दे।
2007 के कटु अनुभवों के आधार पर वर्तमान में भी राज्य का जनजातीय समाज नई परिसीमन प्रक्रिया को लेकर अत्यंत सतर्क और आशंकित नजर आ रहा है, जो आने वाले समय में राज्य का सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनने जा रहा है।