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सावन में करें श्री रुद्राष्टकम स्तोत्र का पाठ: दूर होंगे सभी कष्ट, जानें श्रीराम से जुड़ी कथा, सही समय और विधि

सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना और उपासना के लिए अत्यंत विशेष और पावन माना जाता है।

इस दौरान श्रद्धालु मंदिरों और शिवालयों में जाकर महादेव का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक और रुद्राभिषेक करते हैं। सावन में भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और शुभ फलों की प्राप्ति होती है। मंदिरों के साथ-साथ सावन के दौरान घर पर भी शिव जी की विधि-विधान से उपासना करना विशेष फलदायी होता है।

इसी कारण सावन में शिव भक्त अपने घरों में शिव पुराण का पाठ करते हैं और महामृत्युंजय जैसे दिव्य मंत्रों का जाप करते हैं। इसके अलावा सावन के दिनों में ‘श्री रुद्राष्टकम स्तोत्र’ का पाठ करना भी बेहद पुण्यदायी माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने भी महादेव को प्रसन्न करने के लिए इस स्तोत्र का पाठ किया था।

🛕 गोस्वामी तुलसीदास जी ने की है इसकी रचना, रामेश्वरम में श्रीराम ने किया था पाठ

श्री रुद्राष्टकम स्तोत्र भगवान शिव की स्तुति में रचित सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली स्तोत्रों में से एक माना जाता है।

इसके रचयिता महान संत गोस्वामी तुलसीदास जी माने जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लंका पर चढ़ाई करने से पहले भगवान श्रीराम ने तमिलनाडु के रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना की थी। उसी दौरान उन्होंने महादेव की आराधना करते हुए भावविभोर होकर रुद्राष्टकम का पाठ किया था। मान्यता है कि रुद्राष्टकम के नियमित और मन से किए गए पाठ से व्यक्ति का मन शांत होता है और मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है।

⏰ सावन में किस समय करें रुद्राष्टकम का पाठ? जानें ब्रह्म मुहूर्त का महत्व

सावन के महीने में रुद्राष्टकम का पाठ करने के लिए सुबह का समय यानी ब्रह्म मुहूर्त सबसे उत्तम माना जाता है।

क्योंकि सावन का पूरा महीना शिव भक्ति को समर्पित है, इसलिए इस दौरान सुबह और शाम दोनों समय नियमित रूप से रुद्राष्टकम का पाठ करना विशेष फल देने वाला होता है। मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति सावन में लगातार 7 दिनों तक पूर्ण विधि-विधान और शुद्धता के साथ रुद्राष्टकम का पाठ करता है, तो उसे महादेव का आशीर्वाद अवश्य प्राप्त होता है।

🔱 रुद्राष्टकम का पाठ करने की सरल और सही पूजन विधि

सावन के दौरान रोजाना घर पर रुद्राष्टकम का पाठ करने के लिए निम्नलिखित विधि का पालन करना चाहिए:

  • स्नान व ध्यान: प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

  • सूर्य देव को अर्घ्य: सर्वप्रथम तांबे के लोटे से सूर्य देव को जल अर्पित करें।

  • दीप प्रज्वलन: पूजा स्थान पर घी का दीपक जलाएं और भगवान शिव तथा माता पार्वती का ध्यान करें।

  • जलाभिषेक: शिवलिंग या शिव प्रतिमा पर शुद्ध जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करें।

  • पाठ व आरती: इसके बाद शांत मन से श्रद्धापूर्वक श्री रुद्राष्टकम स्तोत्र का पाठ करें और अंत में आरती करें।

  • भोग व प्रार्थना: पाठ पूर्ण होने पर महादेव को खीर, फल या मेवे का भोग लगाएं और अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।

📜 संपूर्ण श्री रुद्राष्टकम स्तोत्र (Shri Rudrashtakam Stotram)

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।।1।।

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं, गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।

करालं महाकाल कालं कृपालं, गुणागार संसारपारं नतोऽहं।।2।।

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्रीशरीरं।

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा, लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा।।3।।

चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं, प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं।

मृगाधीशचर्माम्बरं मुंडमालं, प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।।4।।

प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं, अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं।

त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं, भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।।5।।

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी, सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।

चिदानन्द संदोह मोहापहारी, प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।6।।

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं, भजंतीह लोके परे वा नराणां।

न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं, प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।।7।।

न जानामि योगं जपं नैव पूजां, नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।

जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं, प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो।।8।।

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।

ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।9।।