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Vedanta ONGC Dispute: दिल्ली हाईकोर्ट से वेदांता को बड़ा झटका, गुजरात तेल क्षेत्र का जिम्मा अब ONGC के पास

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने गुजरात के एक अपतटीय तेल क्षेत्र के लिए वेदांता (Vedanta) के साथ उत्पादन साझेदारी अनुबंध (PSC) की अवधि बढ़ाने से इनकार करने के केंद्र सरकार के फैसले को बुधवार को बरकरार रखा है। इसके साथ ही कोर्ट ने इस तेल क्षेत्र के परिचालन का जिम्मा ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ONGC) को सौंपने के सरकार के फैसले को भी सही ठहराया है। न्यायमूर्ति पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने वेदांता लिमिटेड की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के आदेश को निरस्त करने का अनुरोध किया गया था।

क्या है पूरा मामला और अनुबंध का इतिहास?

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने अपने आदेश के जरिये गुजरात के सुवाली तेल क्षेत्र के लिए 20 जून 1998 के पीएससी (PSC) की अवधि बढ़ाने संबंधी कंपनी के वर्ष 2021 के आवेदन को खारिज कर दिया था। केंद्र सरकार, वेदांता, ओएनजीसी और इन्वेनायर पेट्रोडाइन लिमिटेड के बीच हुए मूल अनुबंध की अवधि 25 वर्ष (30 जून 1998 से 29 जून 2023 तक) थी। पीएससी के तहत वेदांता नामित परिचालक थी। पांच अंतरिम विस्तार दिए जाने के बाद, अंतिम अंतरिम विस्तार 29 सितंबर 2024 को समाप्त हो गया था। इससे पहले वेदांता ने जून 2021 में अनुबंध की अवधि 10 वर्ष बढ़ाकर 29 जून 2033 तक करने का अनुरोध किया था।

कोर्ट ने क्यों ठहराया सरकार का फैसला सही?

अपने फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार के हिस्से की राशि को ‘एकतरफा’ रूप से काटकर उत्पाद शुल्क से संबंधित अपनी देनदारी की भरपाई करना कंपनी की मनमानी थी और अनुबंध विस्तार से इनकार करने के लिए यह पर्याप्त आधार था। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, “प्रथम दृष्टया यह एकतरफा कटौती सद्भावना से नहीं की गई थी। याचिकाकर्ता भारत के लोगों के सार्वजनिक संसाधनों का प्रबंधन कर रहा है। सरकार को किसी निजी कंपनी की मनमानी, उसकी अपनी व्याख्याओं या इच्छाधारित निष्कर्षों के आधार पर बंधक नहीं बनाया जा सकता, जो केंद्र के हिस्से की अनदेखी करे।”

वेदांता और केंद्र सरकार की दलीलें

याचिका में वेदांता ने दलील दी थी कि हालांकि अनुबंध विस्तार उसका अपरिहार्य अधिकार नहीं था, लेकिन सरकार का आदेश विस्तार नीति के उल्लंघन में और अप्रासंगिक आधारों पर पारित किया गया था। इसके विपरीत, केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उसका यह फैसला पूरी तरह से जनहित में और सार्वजनिक न्यास सिद्धांत के तहत उसके दायित्वों के अनुरूप लिया गया है। गौरतलब है कि उच्च न्यायालय ने जनवरी में वेदांता की याचिका पर अंतरिम आदेश पारित करते हुए दोनों पक्षों को यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया था, जिसे अब अंतिम फैसले के साथ खारिज कर दिया गया है।