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नारी शक्ति वंदन बिल में इतनी ‘जल्दबाजी’ क्यों? चुनावी मास्टरस्ट्रोक या कोई बड़ा बदलाव; पर्दे के पीछे की पूरी कहानी

16 अप्रैल को महिला आरक्षण कानून यानि नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक पास करवाने के लिए संसद का विशेष तीन दिवसीय बैठक बुलाया गया है. संसद का यह सत्र बजट सत्र का ही हिस्सा होगा. सवाल यह है कि आखिरकार विपक्ष के विरोध के बावजूद केंद्र सरकार नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक इतनी जल्दीबाजी में क्यों लाना चाहती है?

बताया जा रहा है कि नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक लाने का मकसद बंगाल और तमिलनाडु चुनाव से ठीक पहले महिला आरक्षण संशोधन विधेयक लाकर केंद्र सरकार दोनों राज्यों में महिला मतदाताओं को अपने पक्ष में आकर्षित करना चाहती है.

केंद्र सरकार के सूत्रों का यह कहना है कि 2023 में जब नारी वंदन कानून बनाया गया था, तब यह तय हुआ था कि महिलाओं को आरक्षण देना है, लेकिन अब इस संशोधन विधेयक के जरिए यह तय होगा कि उनको आरक्षण किस रूप में, किस प्रकार से देना है और उसकी पूरी प्रक्रिया क्या होगी.

नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक लाने की क्या वजह?

संशोधन बिल लाने के पीछे का एक मकसद ये भी बताया जा रहा की 2023 में जब इस बिल को पास किया गया था, तब इसकी प्रक्रिया के तहत ये तय किया गया था कि सबसे पहले देश में जनगणना होगा. उसके बाद लोकसभा और विधानसभा का परिसीमन होगा और उसके बाद ही अंत में महिला आरक्षण लागू किया जाएगा. नए संशोधन विधेयक के जरिए केंद्र सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि यदि किसी कारण बस जनगणना होने में देरी भी होती है तो पुराने जनगणना यानि सेंसस 2011 को ही आधार बनाकर परिसीमन कर दिया जाएगा और महिला आरक्षण बिल लागू कर दिया जाएगा.

इस बिल को लाने के पीछे एक कारण ये भी बताया जा रहा है कि किसी भी सूरत में केंद्र सरकार 2029 में होने वाले आगामी लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण कानून लागू करना चाहती है. नए बिल में यह प्रावधान होगा की मार्च 2019 के बाद देश में होने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में महिलाओं को 33% आरक्षण लागू हो.

इस क्रम में महिलाओं के लिए सीटें लॉटरी द्वारा आरक्षित की जाएंगी जो 15 वर्षों तक वैध रहेंगी जिसे बाद जिसके बाद इसमें बदलाव किए जा सकेगा.

लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए होंगी आरक्षित

सूत्रों के मुताबिक मुताबिक 2011 की जनगणना को आधार मानकर ही परिसीमन आनुपातिक आधार पर करने का प्रावधान किया जा है. साथ ही लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों की संख्या में 50% की वृद्धि की जा सकती है, जिससे लोकसभा में राज्यों का मौजूदा हिस्सेदारी समानुपातिक रूप से बरकरार रहेगा. अनुपातिक सीट बढ़ाने की वजह से किसी राज्य में जो आज सीटों की संख्या है उसी के अनुपात में 50 फीसदी सीटें आगे बढ़ जाएंगी.

इसके अलावा केंद्र सरकार 2023 में पारित महिला आरक्षण अधिनियम में संवैधानिक संशोधन करने के लिए एक विधेयक पेश करेगी. पहले के कानून के हिसाब से महिलाओं के लिए आरक्षण परिसीमन नई जनगणना यानी सेंसस 2027 के आधार पर निर्भर था. अब नए प्रस्तावित संशोधन में इसे 2011 में हुए जनगणना को ही आधार मानकर महिलाओं के लिए आरक्षण लागू कर दिया जाएगा जो भविष्य में स्थानांतरित किया जा सकता है.

मिली जानकारी के मुताबिक नए संशोधन में लोकसभा और विधानसभाओं की संशोधित संख्या के आधार पर महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किया जाएगा, जिसमें 33% सीटें आरक्षित होंगी. इसके अनुसार लगभग 816 लोकसभा सीटों में से लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. इस प्रकार, बढ़ी हुई सीटें प्रभावी रूप से लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों के बराबर होंगी.

SC और ST श्रेणियों के लिए आरक्षण में भी 50% की वृद्धि

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति श्रेणियों के लिए आरक्षण में भी 50% की वृद्धि होगी, जिससे लोकसभा में अनुसूचित जाति की सीटें 84 से बढ़कर 126 हो जाएंगी और अनुसूचित जनजाति की सीटें 47 से बढ़कर 70 हो जाएंगी. महिलाओं के लिए कोटा समान रूप से लागू होगा, जिसका अर्थ है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति श्रेणियों के अंतर्गत एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 126 सीटों में से 46 सीटें अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 70 सीटों में से 21 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव है.

कुल मिलाकर इस बिल को लाने के पीछे सरकार की मंशा यह है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी महिलाओं के बीच खासा लोकप्रिय हैं और उनकी तमाम महिला केंद्रित योजनाओं से महिलाओं का उनके प्रति झुकाव को बढ़ाता है. इसी तरह से तमिलनाडु में भी डीएमके सरकार ने स्थानीय महिलाओं के लिए कई विशेष योजनाएं चलाई है, जिसकी वजह से डीएमके को महिलाओं का वोट अच्छे खासे तादात में पड़ता है. अब बीजेपी पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में महिलाओं के झुकाव में अपनी हिस्सेदारी लेना चाहती है और इसी के तहत इस बिल को विधानसभा चुनाव के मतदान से ठीक पहले लाने जा रही है.