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Jabalpur Sand Mafia Submarine: जबलपुर में रेत निकालने वाली ‘पनडुब्बी’! अवैध उत्खनन का पूरा गणित और माफिया का खतरनाक जुगाड़

जबलपुर : इन दिनों खाड़ी में युद्ध चल रहा है और पनडुब्बी यानी सबमरीन की चर्चा होती है लेकिन जबलपुर में एक दूसरे ही किस्म की पनडुब्बी काम कर रही है. यह किसी युद्ध में तो काम नहीं करती ना किसी पर हमला करती लेकिन यह पनडुब्बी नर्मदा नदी से अवैध तरीके से रेत निकालती है. आपने सही सुना, ये जुगाड़ की है मशीन रेत माफियाओं ने बनाई है जो नर्मदा नदी की तलहटी को बर्बाद करने में सबसे बड़ा योगदान दे रही है. जबलपुर और उससे लगे आसपास के क्षेत्रों में रेत माफिया बड़े पैमाने पर अवैध रेत उत्खनन कर रहे हैं और सत्ता में बैठे लोगों के संरक्षण की वजह से प्रशासन के हाथ बंधे हुए हैं.

जबलपुर में रेत की भारी डिमांड

जबलपुर में इस समय सरकारी और निजी निर्माण बड़े पैमाने पर हो रहे हैं. जबलपुर के चारों ओर एक रिंग रोड भी बन रही है. इस पर कई ब्रिज, अंडर पास भी बन रहे हैं. इतना ही नहीं, शहर के अंदर कई मल्टी स्टोरी बिल्डिंगों का निर्माण हो रहा, जिसके चलते बड़े पैमाने पर रेत या बालू की जरूरत होती है. ऐसे में शहर में रेत सप्लाई का फायदा उठाने माफिया सक्रिय रहते हैं. जबलपुर के आसपास की नदियां और खासतौपर पर नर्मदा ही बालू रेत का सबसे बड़ा स्रोत है. जबलपुर में सबसे ज्यादा रेत नर्मदा नदी से रेत निकाली जाती है.इसके बाद हिरण और गौर जैसी छोटी नदियां भी हैं, जिनसे बालू निकली जाती है.

रेत का ठेका और अवैध रेत का खेल

सरकार बालू या रेत का ठेका नीलाम करती है नदियों के किनारे घाट पर इकट्ठी होने वाली रेत को इस्तेमाल करने की अनुमति रहती है. लेकिन जब से जेसीबी जैसी बड़ी मशीन आ गई हैं तब से नदी के घाटों पर रेत पूरी तरह खत्म हो गई है. अब ऐसी हालत में बालू माफिया नदी के अंदर री रेतल निकालकर गुपचुप तरीके से बेच देते हैं, जो पूरी तरह से गैरकानूनी है.

बालू माफिया कैसे काम करता है

बालू बेचना सबसे सरल धंधा है और जैसे-जैसे इसकी कमी हो रही है यह धंधा और अधिक मुनाफे वाला हो गया है. जबलपुर में रेत माफिया को नदी के घाट पर रेट नहीं मिल रहे, तो वे नदी के अंदर की रेत निकालने के लिए नए-नए जुगाड़ लगाते रहते हैं. कुछ लोग नाव लेकर नदी के बीच में पहुंचते हैं और नदी में कम पानी वाली जगह पर मानव श्रम से रेत निकलवाते हैं, ये काफई कठिन काम होता है. लेकिन धीरे-धीरे इसकी जगह माफिया की मशीनों ने ले ली है.

नदी के बीच तक सड़क बनाकर रेत निकालना

जबलपुर के बेलखेड़ा के पास नर्मदा नदी में एक दूसरा तरीका भी देखने को मिलता है. यहां एक बड़ी जेसीबी मशीन घाट से नदी के ठीक बीचों-बीच तक सड़क बनाती है, जहां रेत उपलब्ध है. इसके बाद मशीन और ट्रक नदी के बीच तक जाते हैं. नदी की गहराई से मशीन रेत निकाल कर डंपर को भरती रहती है.

फिर आई रेत वाली पनडुब्बी

एक तीसरा तरीका भी है जिसे पनडुब्बी यह हाई-फाई मशीन के नाम से जाना जाता है. यह पनडुब्बी या हाई-फाई मशीन एक बड़ा मैकेनिक जुगाड़ है. इसमें एक बड़ी सी नाव के ऊपर ट्रक का पुराना इंजन रखा जाता है और एक बहुत बड़ा पंप इस इंजन से जोड़ दिया जाता है. फिर एक लगभग 6 इंची पाइप नदी के तल तक जाता है, जहां से पाइप रेत और पानी को एक साथ खींचता है और एक लंबे से पाइप के जरिए नदी के अंदर की बालू निकालकर घाट पर गिर जाती है. नाव धीरे-धीरे अपनी जगह बदलती रहती है और नदी के अंदर से तब तक रेत निकाली जाती है जब तक मिट्टी न आने लगे. इससे जलीय जीवों को भी भारी नुकसान होता है.

पूर्व विधायक ने लगाए रेत उत्खनन के आरोप

जबलपुर के बरगी विधानसभा के पूर्व विधायक संजय यादव ने कहा, ” नियम के तहत पानी के अंदर से रेत नहीं निकाली जा सकती. जबलपुर में बीते 4 महीने से बालू का ठेका नहीं हुआ है लेकिन इसके बावजूद बालू की खुदाई चल रही है.” उन्होंने आरोप लगाया है कि बालू की पूरी खुदाई सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों के इशारों पर हो रही है और जो टैक्स सरकार को मिलना चाहिए था वह जन प्रतिनिधियों के पास पहुंच रहा है.

रेत के अवैध उत्खनन को लेकर जबलपुर के एडिशनल एसपी सूर्यकांत शर्मा ने कहा, ” हमें जहां भी ऐसी जानकारी मिलती है वहां पुलिस की टीम गैरकानूनी बालू को पकड़ने का काम करती है और यह गैर कानूनी काम करने वाले लोगों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे भी बनाए जाते हैं.”

रेत माफियाओं को जनप्रतिनिधियों का संरक्षण?

जबलपुर में जिला खनिज अधिकारी, माइनिंग कॉरपोरेशन, जिला राजस्व अधिकारी के साथ ही पुलिस को यह अधिकार है कि वह गैर कानूनी खनन रोक सकती है. इसे लेकर उनकी टीम भी बनी है और देखने के लिए कभी कबार कार्रवाई भी होती है लेकिन पुलिस रेत माफियाओं को रोक पाती क्योंकि उनके सत्ता में बैठे जनप्रतिनिधियों से सीधे संबंध हैं.

रेत घटते ही प्रदूषित होने लगती है नदी

नदी के पर्यावरण पर अध्ययन करने वाले डॉक्टर अर्जुन शुक्ला कहते हैं, ” नदी की बालू में बहुत छोटे-छोटे से जीव होते हैं, जो छोटे शंख के आकार के होते हैं. इन्हें मोलस्क कहा जाता है. दरअसल, पानी के भीतर की गंदगी को मछली के अलावा यह दूसरे छोटे जीव भी साफ करते हैं. यह गंदगी को खा लेते हैं जिससे पानी साफ हो जाता है. इसी तरीके से बालू एक नेचुरल फिल्टर का काम भी करती है. इसलिए जिस नदी से बालू खत्म हो जाती है उस नदी का प्रदूषण बढ़ जाता है.