Manisha Bhanwala World Wrestling Champion: विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं मनीषा भानवाला, दिवंगत पिता को समर्पित की जीत
जींद: हरियाणा के जींद जिले से ताल्लुक रखने वाली और हाल ही में कजाकिस्तान की राजधानी अस्ताना में आयोजित विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन करने वाली प्रतिभावान पहलवान मनीषा भानवाला की जीत महज एक खेल की सफलता नहीं है, बल्कि यह उनके अदम्य संघर्ष और पिता के सपनों की सच्ची उड़ान है। स्वर्ण पदक जीतने के बाद जब मनीषा ने अपने माता-पिता की तस्वीरों वाली सफेद टी-शर्ट निकालकर दर्शकों और दुनिया के सामने गर्व के साथ प्रदर्शित की, तो वह पल हर किसी की आंखें नम कर देने वाला था। यह उस समर्पित बेटी की ओर से अपने दिवंगत पिता को एक भावुक श्रद्धांजलि थी, जिन्होंने वर्षों तक अपनी बेटी को शिखर पर देखने का सपना संजोया था। भारत की पहली महिला कुश्ती विश्व चैंपियन बनीं मनीषा के लिए यह स्वर्ण पदक केवल उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि ही नहीं, बल्कि उनके पूरे परिवार के अरमानों के पूरा होने का ऐतिहासिक क्षण था। खासतौर पर उनके पिता सुरेश के लिए, जिनका वर्ष 2022 में ठीक उसी दिन अचानक निधन हो गया था जिस दिन मनीषा एशियाई चैंपियनशिप के लिए रवाना होने वाली थीं।
जींद के एक साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखती हैं मनीषा, भाई को खेलते देख जगा था खेलों के प्रति प्रेम
हरियाणा के जींद जिले की माटी से जुड़ी मनीषा एक बेहद साधारण किसान परिवार से आती हैं, जहाँ खेल-कूद का माहौल हमेशा से ही उनकी जिंदगी का हिस्सा रहा है। उनके भाई रिंकू एक जाने-माने कबड्डी खिलाड़ी हैं, जबकि उनकी भाभी ममता सिहाग भी कुश्ती के अखाड़े से जुड़ी एक पहलवान हैं। बचपन में अपने भाई को गांव की माटी में कबड्डी खेलते हुए देखने के बाद ही मनीषा के कोमल मन में खेलों के प्रति गहरी रुचि और उत्साह पैदा हुआ था। उनके भाई रिंकू ने इस बारे में साझा करते हुए बताया कि उनके परिवार का माहौल हमेशा से खेलों से ओतप्रोत रहा है। मनीषा अक्सर उन्हें गांव में कबड्डी खेलते हुए निहारती थी और वहीं से उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली। इसके बाद परिवार ने यह विचार किया कि उसे किसी टीम गेम के बजाय व्यक्तिगत (इंडिविजुअल) खेल में अपनी किस्मत आजमानी चाहिए। शारीरिक रूप से मजबूत होने के साथ-साथ उनकी मानसिक दृढ़ता और अटूट हौसला हमेशा से उनकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुई है। हालांकि, इस ऐतिहासिक स्वर्ण पदक तक पहुँचने का मनीषा का यह सफर अनगिनत कठिनाइयों, संघर्षों और मर्मस्पर्शी दुखों के साये से गुजरा है।
पिता के आकस्मिक निधन से टूट गई थीं मनीषा, परिवार की समझाइश के बाद मंगोलिया रवाना होकर जीता था कांस्य पदक
भाई रिंकू को वह मनहूस सुबह आज भी अच्छी तरह याद है, जब मनीषा को एशियाई चैंपियनशिप में भाग लेने के लिए मंगोलिया के सफर पर निकलना था। उनके पिता बीती रात एक धार्मिक जागरण में शामिल हुए थे और अगली सुबह नींद के आगोश में ही दिल का दौरा पड़ने से उनका आकस्मिक निधन हो गया था। अपने पिता के अचानक यूं चले जाने से मनीषा अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थीं। उनका घर से बाहर कदम रखने या कहीं भी जाने का बिल्कुल मन नहीं था, और यहाँ तक कि उन्होंने कुश्ती को हमेशा के लिए अलविदा कहने का मन भी बना लिया था। उस घटना को याद करते हुए रिंकू बताते हैं कि वह अपनी रवानगी की पूरी तैयारी कर चुकी थीं, लेकिन उसी मनहूस सुबह उनके पिता का साया उनके सिर से उठ गया। मनीषा उस वक्त घर छोड़कर जाने को तैयार नहीं थीं। परिवार के लोगों को उन्हें बहुत समझाना पड़ा और यह अहसास कराना पड़ा कि यदि उन्होंने इस मोड़ पर आकर कुश्ती छोड़ दी, तो उनके पिता ने उन्हें एक महान पहलवान बनाने के लिए जो वर्षों तक खून-पसीना बहाया था, वह सब व्यर्थ चला जाएगा। काफी जद्दोजहद और समझाने के बाद वे किसी तरह मनीषा को मंगोलिया जाने वाली फ्लाइट में बैठाने में कामयाब रहे थे। आखिरकार मनीषा ने उस प्रतियोगिता में अपनी पूरी क्षमता के साथ हिस्सा लिया और कांस्य पदक जीतकर अपने देश और परिवार का मान बढ़ाया। यहीं से उनके उस स्वर्णिम सफर का आगाज हुआ, जिसने आगे चलकर उन्हें कुश्ती जगत के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचा दिया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार तीन अन्य एशियाई पदक अपने नाम किए, जिसमें पिछले वर्ष हासिल किया गया स्वर्ण पदक भी शामिल है।
अस्ताना जाने से पहले बनवाई थी खास टी-शर्ट, फाइनल में अमेरिकी पहलवान को हराकर पूरा किया पिता का अधूरा सपना
कजाकिस्तान के अस्ताना शहर के लिए रवाना होने से पहले मनीषा ने अपनी इस सबसे बड़ी प्रतियोगिता के लिए एक बेहद खास और भावनात्मक तैयारी की थी। उन्होंने विशेष रूप से अपने माता-पिता की मुस्कुराती हुई तस्वीरों वाली एक सफेद टी-शर्ट तैयार करवाई थी, ताकि इस महामुकाबले के दौरान उनके माता-पिता की यादें और उनका आशीर्वाद हर पल उनके साथ बना रहे। उनके भाई रिंकू ने गर्व से बताया कि अस्ताना जाने से पूर्व उसने माता-पिता की तस्वीरों को टी-शर्ट पर मुद्रित करवाया था और मन में यह दृढ़ संकल्प लिया था कि वह विश्व चैंपियनशिप का स्वर्ण पदक जीतकर इस टी-शर्ट को पूरी दुनिया के सामने दिखाएगी। उसने ठीक वैसा ही करके दिखाया। यह उनके संपूर्ण परिवार का एक साझा सपना था कि मनीषा कभी दुनिया की नंबर वन पहलवान बने, जिसे आज उसने अपनी मेहनत के बल पर सच कर दिखाया। यह उनके दिवंगत पिता के लिए विशेष तौर पर गर्व का पल है। फाइनल मुकाबले में अमेरिका की मजबूत पहलवान अबीगेल नेटे के खिलाफ शुरुआती पलों में 8-6 से पिछड़ने के बावजूद मनीषा ने गजब की मानसिक शक्ति का परिचय देते हुए शानदार वापसी की और मुकाबले को अपने नाम कर लिया। जीत के तुरंत बाद जब उन्होंने वह विशेष टी-शर्ट दर्शकों और कैमरे के सामने लहराई, तो ऐसा लगा मानो उन्होंने अपने पिता को उस ऐतिहासिक पल का प्रत्यक्ष हिस्सा बना लिया हो, जिसे देखने की इच्छा उन्होंने अपनी आंखों से संजोई थी, भले ही आज वे इस दुनिया में मौजूद नहीं हैं। जींद के एक छोटे से गांव में भाई को कबड्डी खेलते देखने के दृश्यों से लेकर विश्व कुश्ती के पटरी पर भारत की पहली महिला विश्व चैंपियन बनने तक का मनीषा का यह प्रेरणादायक सफर पारिवारिक त्याग, अटूट संघर्ष, फौलादी इरादों और अपनी माटी से जुड़ी संस्कृति की एक अनूठी दास्तान है। अपने लंबे कुश्ती करियर के दौरान मनीषा ने कई बार अपने भार वर्ग में बदलाव किए; उन्होंने 62 किग्रा, 65 किग्रा और 57 किग्रा जैसे वर्गों में भी अपनी खेल प्रतिभा का प्रदर्शन किया, परंतु 29 वर्ष की परिपक्व उम्र में गैर-ओलंपिक 59 किग्रा भार वर्ग में उन्होंने अपने खेल जीवन का अब तक का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक खिताब जीतकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम अमर कर दिया।