Farooq Abdullah on Article 370: फारूक अब्दुल्ला का बड़ा बयान, सुप्रीम कोर्ट का फैसला गैर-कानूनी— जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा देने पर उठाए सवाल
नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने अनुच्छेद 370 को लेकर एक बार फिर कड़ा बयान दिया है. उन्होंने मीडिया से बातचीत के दौरान दो टूक कहा कि अनुच्छेद 370 को हटाए जाने को सही ठहराने वाला सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूरी तरह से गैर-कानूनी और गलत था. इस फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर में परिसीमन तो जल्दबाजी में करा दिया गया, जबकि देशवासियों और यहाँ के लोगों से राज्य का दर्जा (स्टेटहुड) जल्द बहाल करने का बड़ा वादा किया गया था. इसी देरी पर तीखा सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा, “अब आखिर जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा कहां है?” डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) की कड़ी आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि पार्टी ने जनता से सिर्फ कोरे वादे किए हैं, और जम्मू-कश्मीर को उसका हक यानी राज्य का दर्जा वापस दिलाने की दिशा में अब तक कोई भी ठोस प्रगति नहीं हुई है.
🤝 ‘दिल्ली ने किया सौतेलेपन का व्यवहार’: बिना सहमति छीना गया विशेष दर्जा और दो हिस्सों में बंटा राज्य
सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि नई दिल्ली ने हमेशा से जम्मू-कश्मीर के साथ “सौतेलेपन” का ही व्यवहार किया है. बीजेपी सरकार ने जम्मू-कश्मीर के साथ ऐसा बर्ताव किया है जिसकी कोई मिसाल नहीं मिलती. उन्होंने कहा कि सबसे पहले, यहाँ के लोगों की रजामंदी या सहमति लिए बिना हमारा ऐतिहासिक विशेष दर्जा छीन लिया गया और इस संपन्न राज्य को तोड़कर दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया, जबकि आज भी जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा पूरी तरह से अधर में लटका हुआ है. उन्होंने याद दिलाया कि संसद के भीतर और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी जम्मू-कश्मीर के लोगों को यह भरोसा दिलाया गया था कि लोकतांत्रिक चुनाव संपन्न होने के बाद राज्य का दर्जा तुरंत बहाल कर दिया जाएगा, लेकिन चुनाव बीत जाने के बावजूद इस दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया गया है.
⚠️ चुनी हुई सरकार के अधिकारों में एलजी प्रशासन कर रहा दखल, लोकतंत्र में डर की कोई जगह नहीं
फारूक अब्दुल्ला ने स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि हालात तब और भी ज्यादा बदतर हो जाते हैं जब जम्मू-कश्मीर की जनता द्वारा चुनी गई सरकार को वे बुनियादी अधिकार भी नहीं दिए जाते, जो सामान्यतः किसी भी केंद्र शासित प्रदेश की चुनी हुई सरकार को मिलने चाहिए. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “उपराज्यपाल का प्रशासन लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के दैनिक कामकाज में दखलंदाजी करने और उसके विकास कार्यों में बाधा डालने का कोई मौका नहीं छोड़ता.” उन्होंने जोर देकर कहा कि एक सच्चे लोकतंत्र में लोगों को डराने-धमकाने, जबरदस्ती करने, परेशान करने, डर का माहौल पैदा करने, अन्याय करने या जनता की आवाज को दबाने की कोई भी गुंजाइश नहीं होनी चाहिए, और भारत का संविधान भी कभी इस तरह की तानाशाही की इजाजत नहीं देता है.