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Bhopal News: किताबी रट्टा छोड़िए, खेल-खेत और एआई के जरिए गणित को आसान बना रही हैं शिक्षक डॉ. संगीता यादव

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में रहने वाली डॉक्टर संगीता यादव ने बच्चों के मन से गणित के डर को हमेशा के लिए भगाने का एक अनूठा तरीका ढूंढ निकाला है। वे बच्चों को केवल रटा-रटाए सूत्रों से नहीं, बल्कि फुटबॉल के गोल, सोशल मीडिया के आंकड़ों, खेत के क्षेत्रफल और रेलवे की टाइमिंग जैसे व्यावहारिक उदाहरणों से गणित पढ़ाती हैं। उनका पक्का मानना है कि गणित का डर असल में किसी किताब में नहीं होता, बल्कि बच्चे के अपने दिमाग में बैठा होता है, और उस डर को खत्म करने के लिए इस विषय को उसकी अपनी दैनिक जिंदगी से जोड़ना बेहद जरूरी है। साल 2012 से लगातार चल रहे उनके इन शानदार नवाचारों और प्रयोगों को अब जाकर ‘राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार-2026’ के रूप में एक बहुत बड़ी राष्ट्रीय पहचान मिली है। इस प्रतिष्ठित सम्मान के मिलने के बाद अब उनका अगला लक्ष्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के जरिए गणित शिक्षण को और अधिक व्यक्तिगत, सुगम और रोचक बनाना है।

⚽ फुटबॉल मैच के दौरान बत्ती गुल होने पर मिला आइडिया, कक्षा में ‘लिमिट्स’ का कॉन्सेप्ट ऐसे समझाया

डॉ. संगीता के पढ़ाने का अनूठा तरीका एक फुटबॉल मैच के दौरान सामने आए एक साधारण से वाकये से पूरी तरह बदल गया। मैच देखते समय अचानक कुछ सेकंड के लिए स्टेडियम की लाइट चली गई और जब लाइट वापस आई, तो गोल हो चुका था। इसी वास्तविक घटना को उन्होंने अपनी कक्षा में गणित के ‘लिमिट्स’ (Limits) के कॉन्सेप्ट के साथ जोड़कर बहुत ही सरल तरीके से समझाया। इस प्रयोग के बाद बच्चों ने पहली बार इस बात को महसूस किया कि जिस गणित को वे अब तक सबसे कठिन विषय मानते थे, वह उनकी अपनी देखी-सुनी घटनाओं में भी चारों तरफ मौजूद है। बच्चों के चेहरों पर दिखा वह उत्साह और चमक ही डॉक्टर संगीता यादव के लिए उनकी शिक्षण यात्रा का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

📱 इंस्टाग्राम और फेसबुक के सर्वे प्रोजेक्ट से बच्चों को सिखाया प्रतिशत, अनुपात और समानुपात

डॉ. संगीता यादव बताती हैं कि, ”आज के समय में सोशल मीडिया बच्चों की रोजमर्रा की दुनिया का एक अहम हिस्सा बन चुका है। इसलिए वे अपनी कक्षा के बच्चों को इंस्टाग्राम, फेसबुक और लिंक्डइन जैसे लोकप्रिय प्लेटफॉर्म्स पर एक छोटा सर्वे करने का अनोखा प्रोजेक्ट देती हैं। इससे बच्चे खुद अपनी मेहनत से यह पता लगाते हैं कि किस प्लेटफॉर्म को कितने प्रतिशत लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके बाद वे उन्हीं आंकड़ों के आधार पर कक्षा में प्रतिशत, अनुपात और समानुपात के जटिल सवाल हल करवाते हैं। यानी सवाल शिक्षक की तरफ से थोपा नहीं जाता, बल्कि बच्चे की अपनी खोज और जिज्ञासा से खुद-ब-खुद पैदा होता है।”

🌾 गांधीनगर और ग्रामीण परिवेश के बच्चों को खेत के क्षेत्रफल से समझाई गणित की बारीकियां

संगीता का स्पष्ट मानना है कि हर बच्चे पर एक ही तरह का पारंपरिक उदाहरण थोपने से गणित कभी आसान नहीं हो सकती। उदाहरण के लिए, किसी ग्रामीण परिवेश या गांव से जुड़े बच्चे को किताबी परिभाषा की जगह खेत के सटीक उदाहरण से क्षेत्रफल समझाना ज्यादा असरदार साबित होता है। खेत का कुल आकार, उसकी लंबाई-चौड़ाई, कुल क्षेत्रफल और अलग-अलग हिस्सों का आपसी अनुपात निकालते हुए बच्चा खेल-खेल में गणित को अपनी असल दुनिया से जोड़ लेता है। इसी तरह भूकंप जैसी प्राकृतिक घटनाओं के लाइव आंकड़ों से सांख्यिकी और भूगोल को सीधे गणित विषय के साथ आसानी से जोड़ा जा सकता है।

🎲 साल 2012 में क्विज़ और खेल-कूद से शुरू हुआ था सफर, आज दूसरे शहरों तक पहुंचा नवाचार

वे आगे बताती हैं कि गणित को भारी-भरकम किताबों से बाहर निकालने की उनकी यह प्रेरणादायक यात्रा साल 2012 में शुरू हुई थी। स्कूल के ‘बैग लेस डे’ (Bagless Day) के दौरान बच्चों ने ‘स्नेक एंड लैडर्स’ (Sanakes and Ladders), नंबर वॉर और ट्रेजर हंट जैसी मजेदार गतिविधियों के माध्यम से हंसते-खेलते गणित सीखा। इसके बाद स्कूल में ‘गणितोत्सव’ का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें इस विषय को कला, पेंटिंग और संगीत के साथ जोड़ा गया। खेलों के साथ गणित का तालमेल बिठाने के लिए ‘मैथमेटिकल रिले’ और ‘मैथलेटिक्स’ जैसी कई रोमांचक गतिविधियां कराई गईं। शुरुआत में उनके यह सारे प्रयोग केवल उनके अपने स्कूल तक ही सीमित थे, लेकिन अब यह भोपाल की सीमाओं से निकलकर प्रदेश के दूसरे शहरों के स्कूलों तक भी पहुंच चुके हैं।

🎨 बच्चे की व्यक्तिगत पसंद को समझकर तय करती हैं गणित के उदाहरण, समझ बढ़ाना है मुख्य उद्देश्य

डॉ. संगीता यादव की इस विशेष शिक्षण पद्धति का एक सबसे अहम हिस्सा यह है कि वे पहले हर बच्चे की व्यक्तिगत रुचि को समझती हैं और उसी के अनुसार उदाहरण चुनती हैं। खेल-कूद में रुचि रखने वाले बच्चे को खेल के आंकड़ों से गणित समझाई जाती है, जबकि चित्रकारी या ड्राइंग पसंद करने वाले विद्यार्थी को ज्योमेट्री (ज्यामिति) के विभिन्न चित्रों के जरिए अवधारणाओं को स्पष्ट किया जाता है। उनका पूरा जोर इस बात पर रहता है कि बच्चा केवल यह न जाने कि उसे क्या पढ़ना है, बल्कि वह यह भी अच्छी तरह समझे कि उसे यह क्यों पढ़ना है और भविष्य में इसका व्यावहारिक इस्तेमाल कहां और कैसे होगा।

🤖 राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के बाद अब एआई (AI) के जरिए गणित शिक्षण को नया आयाम देने की तैयारी

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित होने के बाद अब डॉक्टर संगीता की जिम्मेदारी औरंगाबाद और पूरे समाज के प्रति और अधिक बढ़ गई है। अब उनका पूरा फोकस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को स्कूली गणित शिक्षण के साथ पूरी तरह एकीकृत करने पर है। उनका मानना है कि एक ही कक्षा में बैठे सभी बच्चों की सीखने की गति और क्षमता कभी भी समान नहीं होती है। एआई की आधुनिक तकनीक की मदद से अलग-अलग स्तर और रुचि रखने वाले बच्चों के लिए कस्टमाइज्ड सवाल, खेल और सीखने की नई गतिविधियां बहुत आसानी से तैयार की जा सकती हैं। वह आने वाले समय में अन्य शिक्षकों को भी इन आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल के लिए पूरी तरह प्रशिक्षित करना चाहती हैं।

🧠 ‘मैं गणित नहीं कर सकता’ वाली नकारात्मक सोच को बच्चों के मन से सबसे पहले हटाना है मकसद

डॉ. संगीता के अनुसार, ”गणित के डर को हमेशा के लिए खत्म करने की असली शुरुआत कभी किसी रटे-रटाए सूत्र से नहीं होती, बल्कि बच्चे के अपने अटूट आत्मविश्वास से होती है। बच्चे के मन से ‘मैं गणित कभी नहीं कर सकता’ वाली नकारात्मक सोच को सबसे पहले बाहर निकालना होगा। छोटे-छोटे दिलचस्प प्रयोगों, खुलकर आपसी बातचीत और बच्चे की अपनी पसंद के उदाहरणों के माध्यम से वह आज कक्षाओं में बच्चों के अंदर स्वाभाविक जिज्ञासा और बेहतरीन समस्या-समाधान की क्षमता विकसित करने पर पूरी ताकत से जोर दे रही हैं।”