नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति (जस्टिस) यशवंत वर्मा के विरुद्ध लगाए गए संगीन आरोपों की निष्पक्ष जांच करने वाली उच्चस्तरीय समिति की विस्तृत रिपोर्ट बुधवार को राज्यसभा के पटल पर पेश की गई।
जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास से कथित तौर पर भारी मात्रा में बेहिसाब नकदी बरामद होने के मामले में उन्हें पद से हटाने (महाभियोग) की संवैधानिक कार्यवाही प्रारंभ की गई थी। राज्यसभा के महासचिव पी.सी. मोदी ने जांच समिति की दो खंडों वाली व्यापक रिपोर्ट सदन के समक्ष रखी। इसके साथ ही जांच प्रक्रिया के दौरान दर्ज किए गए मौखिक बयानों और दस्तावेजी साक्ष्यों के अभिलेख भी पेश किए गए।
🏛️ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने किया था समिति का गठन, मई में सौंपी गई थी गोपनीय रिपोर्ट
उल्लेखनीय है कि तीन सदस्यीय जांच समिति ने मई माह में ही अपनी जांच रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी थी।
ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से कथित रूप से बड़ी धनराशि मिलने के संवेदनशील प्रकरण की गहन जांच हेतु इस समिति का गठन किया था। लोकसभा की आधिकारिक कार्यसूची के अनुसार, निचले सदन के महासचिव भी जांच रिपोर्ट के दोनों खंडों तथा मौखिक साक्ष्यों को सदन के पटल पर रखेंगे।
🔥 सरकारी आवास में आग लगने से उजागर हुआ था कैश कांड, सीजेआई समिति ने पाया था नियंत्रण
प्रकरण की शुरुआत 14 मार्च 2025 की रात्रि में हुई, जब जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में अचानक भीषण आग लग गई थी।
आग पर काबू पाने पहुँचे दमकलकर्मियों को कथित तौर पर एक स्टोर रूम से भारी मात्रा में अधजली नकदी मिली थी। इस प्रकरण के सामने आने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट से उनका स्थानांतरण उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया गया था। तत्कालीन सीजेआई संजीव खन्ना द्वारा गठित आंतरिक जांच समिति ने निष्कर्ष निकाला था कि न्यायमूर्ति वर्मा का उस विशेष स्टोर रूम पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण था, जहां नकदी रखी गई थी।
📜 200 से अधिक सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव पर किए थे हस्ताक्षर, जस्टिस वर्मा ने दिया था इस्तीफा
जुलाई 2025 में संसद के दोनों सदनों के 200 से अधिक सांसदों ने न्यायमूर्ति वर्मा को पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे।
तत्पश्चात अगस्त में जांच समिति का गठन हुआ। हालांकि, संसद द्वारा हटाए जाने की प्रशासनिक संभाविता को देखते हुए जस्टिस वर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद से अपना त्यागपत्र दे दिया था, जिससे उनके विरुद्ध महाभियोग की कार्यवाही पर तकनीकी रोक लग गई थी। यद्यपि उनके इस्तीफे की आधिकारिक अधिसूचना कानून मंत्रालय द्वारा जारी होना अभी अवशेष है।
⚖️ जानिए क्या है हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के जजों को पद से हटाने और इस्तीफे की संवैधानिक प्रक्रिया
संवैधानिक विशेषज्ञों और सर्वोच्च अदालत के न्यायशास्त्र के अनुसार, यदि कोई न्यायाधीश भारत के राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र सौंपते हैं और उसकी प्रति सार्वजनिक हो जाती है, तो विधिक रूप से उनका पदत्याग प्रभावी मान लिया जाता है।
यद्यपि न्यायाधीश का त्यागपत्र राष्ट्रपति की व्यक्तिगत स्वीकृति पर निर्भर नहीं होता, फिर भी प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति औपचारिक रूप से इसे स्वीकार करते हैं, जिसके उपरांत केंद्रीय कानून मंत्रालय का न्याय विभाग (Department of Justice) इसकी आधिकारिक अधिसूचना जारी करता है।