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डांगावास हत्याकांड: 11 साल बाद अदालत का बड़ा फैसला, CBI सबूत साबित करने में नाकाम, सभी 40 आरोपी बरी

नागौर/जयपुर (राजस्थान): राजस्थान के नागौर जिले के बहुचर्चित ‘डांगावास हत्याकांड’ मामले में घटना के 11 वर्ष पश्चात अदालत का अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सामने आया है। वर्ष 2015 में 23 बीघा विवादित भूमि के कब्जे को लेकर हुए खूनी संघर्ष और 5 दलितों की दर्दनाक मौत के मामले में विशेष अदालत ने सभी 40 आरोपियों को दोषमुक्त (बरी) कर दिया है। अदालत ने अपने 245 पृष्ठों के विस्तृत फैसले में स्पष्ट किया है कि 14 मई 2015 को घटित हिंसक वारदात में 5 लोगों की मृत्यु अवश्य हुई थी, परंतु केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य यह सिद्ध करने में पूर्णतः विफल रहे कि इस जघन्य अपराध को अंजाम देने वाले वास्तविक आरोपी कौन थे।

⚖️ जमीन विवाद में हुआ था खूनी तांडव, विरोधाभासी बयानों व साक्ष्यों के अभाव में कमजोर पड़ा CBI का केस

इस संवेदनशील मामले में एक तरफ जहां 5 दलितों की हत्या हुई थी, वहीं दूसरे पक्ष के भी एक व्यक्ति की गोली लगने से मृत्यु हो गई थी।

तत्कालीन समय में दलित संगठनों के भारी विरोध और राजनीतिक दबाव के उपरांत इस केस की विवेचना सीबीआई को सौंपी गई थी। तथापि, सीबीआई द्वारा दाखिल आरोप पत्र (Charge-sheet) में चश्मदीद गवाहों के बयानों में परस्पर विरोधाभास, हत्या में प्रयुक्त हथियारों की बरामदगी न होना और मुख्य हमलावरों की स्पष्ट पहचान न हो पाना अदालत में सीबीआई के दावों पर भारी पड़ा।

🌾 1964 से जारी था 23 बीघा जमीन का विवाद, झोपड़ी बनाने को लेकर हुआ था संघर्ष

नागौर जिले के मेड़ता रोड थाना क्षेत्र अंतर्गत डांगावास गांव में 23 बीघा 5 बिस्वा जमीन के स्वामित्व व कब्जे को लेकर दो पक्षों के मध्य दशकों पुराना भूमि विवाद चला आ रहा था।

सीबीआई जांच रिपोर्ट के अनुसार, विवादित भूमि वर्ष 1964 में मात्र ₹1,500 में चिमनाराम जाट के पास गिरवी रखी गई थी। चिमनाराम के देहावसान के बाद उनके पुत्रों कानाराम व ओमाराम का जमीन पर आधिपत्य रहा, परंतु कालांतर में रतनाराम मेघवाल ने जमीन पुनः प्राप्त करने के उद्देश्य से वहां झोपड़ी व पक्का कमरा निर्मित कर लिया था।

⚔️ 14 मई 2015 का खूनी तांडव, सैकड़ों की भीड़ ने किया था हमला

14 मई 2015 को लगभग 200 से 250 लोग ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल एवं धारदार हथियारों के साथ विवादित खेत में जबरन घुस आए थे।

इस भीषण हिंसक झड़प में रतनाराम, पोखरराम, पांचाराम, खेमाराम और गणपतराम मेघवाल की मौत हो गई थी, जबकि दूसरे पक्ष के रामपाल पुरी की भी गोली लगने से जान चली गई थी। इस घटना के बाद संपूर्ण प्रदेश में जातीय व राजनीतिक तनाव व्याप्त हो गया था।

📌 वे 10 प्रमुख कारण, जिनके चलते अदालत में ध्वस्त हो गया CBI का मामला

  1. गवाहों के बयानों में स्पष्टता का अभाव: अदालत के फैसले का सबसे मुख्य आधार गवाहों के बयानों में सुसंगतता न होना रहा। मृतक रतनाराम के दोनों पुत्र व उनकी पत्नी अदालत में किसी भी हमलावर की पहचान नहीं कर सके। पांचाराम की पत्नी ने किसी आरोपी का नाम नहीं लिया, जबकि उनके पुत्र ने बताया कि उनके पिता की मृत्यु पक्का कमरा ढहने से हुई थी। अन्य गवाहों ने भी यही कहा कि उन्हें अज्ञात हमलावरों की जानकारी नहीं है।

  2. ‘पूर्व नियोजित हत्या’ की सीबीआई थ्योरी खारिज: सीबीआई का दावा था कि आरोपी पूर्व नियोजित साजिश के तहत हथियारों से लैस होकर आए थे। हालांकि, गवाह सोनकी देवी के अनुसार, भीड़ आने के बाद लगभग 20-25 मिनट तक पीड़ित पक्ष के लोग हाथ जोड़कर शांति की गुहार लगाते रहे। कोर्ट ने माना कि इतनी लंबी बातचीत यह दर्शाती है कि भीड़ का एकमात्र उद्देश्य पूर्व नियोजित हत्या करना नहीं था।

  3. दोनों पक्षों के मध्य हिंसक संघर्ष: अदालत ने माना कि यह मामला एकतरफा हमले का नहीं था। मुख्य गवाह श्रवणराम ने स्वीकार किया कि लगभग एक घंटे तक दोनों पक्षों की ओर से पथराव हुआ था। एक अन्य गवाह ने बताया कि मुख्य भीड़ खेत में न होकर 1.5 से 2 किलोमीटर दूर बस स्टैंड पर जमा थी, जिससे 300 लोगों के सीधे हमले का दावा कमजोर हुआ।

  4. 40 आरोपियों की भूमिका और पहचान में अस्पष्टता: घटना के दो घंटे के भीतर जांच अधिकारी के पास केवल 13 नाम थे, जो कालक्रम में बढ़कर 40 हो गए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब यह साबित ही नहीं हुआ कि कौन व्यक्ति गैर-कानूनी मजमे का हिस्सा था, तब सामूहिक अपराध का केस सिद्ध नहीं होता।

  5. हथियारों व आरोपियों का संबंध सिद्ध न होना: घटनास्थल से लाठियां, सरिए, कुल्हाड़ी और लोहे की चेन बरामद हुईं, परंतु सीबीआई यह स्थापित नहीं कर सकी कि किस विशिष्ट आरोपी के पास कौन सा हथियार था।

  6. ट्रैक्टर से कुचलने का आरोप अप्रमाणित: सीबीआई जिस ट्रैक्टर से झोपड़ी ध्वस्त करने और लोगों को कुचलने का दावा कर रही थी, उस वाहन को जब्त ही नहीं किया जा सका। गवाह अदालत में यह साबित करने में असमर्थ रहे कि कथित ट्रैक्टर मानाराम चला रहा था।

  7. आगजनी के आरोपियों में निरंतर बदलाव: शुरुआती जांच में ओमाराम और कानाराम पर आगजनी का आरोप था, जो बाद में दीपूराम, श्यामलाल और मानाराम पर स्थानांतरित कर दिया गया, जिससे जांच एजेंसी की कहानी संदेहास्पद हो गई।

  8. वैधानिक कब्जे पर अनिश्चितता: कोर्ट ने पाया कि घटना के दिन विवादित भूमि पर वास्तव में किसका कानूनी अथवा वैधानिक कब्जा था, इसे भी सीबीआई अपनी जांच में स्पष्ट नहीं कर सकी।

  9. मेडिकल व पोस्टमार्टम रिपोर्ट में विरोधाभास: चिकित्सकों ने स्वीकार किया कि रतनाराम व पोखरराम को आई चोटें कमरे का मलबा गिरने से भी आ सकती थीं। पांचाराम की मृत्यु पत्थर लगने से हुई, परंतु सैकड़ों की भीड़ में घातक पत्थर किसने फेंका, यह कोई गवाह नहीं बता सका।

  10. चार्जशीट में तकनीकी व साक्ष्य संबंधी गंभीर खामियां: सीबीआई ने जून 2015 में प्राथमिकी दर्ज कर दो चरणों में चार्जशीट पेश की थी। साक्ष्यों की अटूट कड़ी न जुड़ पाने के कारण अदालत ने सभी 40 आरोपियों को ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) प्रदान किया।

🏛️ अदालत की ऐतिहासिक टिप्पणी: “अपराध घटित हुआ, परंतु विधि-सम्मत साक्ष्य से कातिल साबित न हो सके”

अदालत ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में अत्यंत गंभीर टिप्पणी करते हुए लिखा:

“यद्यपि सभी आरोपी दोषमुक्त हो रहे हैं, परंतु यह तथ्य निर्विवाद रूप से साबित है कि 14 मई 2015 की घटना में 5 व्यक्तियों की असमय मृत्यु हुई है। ऐसे में इस दोषमुक्ति का अर्थ यह कदापि नहीं है कि अपराध घटित ही नहीं हुआ। इसका तात्पर्य मात्र यह है कि अपराध कारित करने वाले व्यक्तियों को विधि-सम्मत साक्ष्य द्वारा तय नहीं किया जा सका।”

इसके साथ ही अदालत ने मृतक के आश्रितों एवं सभी घायलों को ‘अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति नियम 1995’ तथा ‘राजस्थान पीड़ित प्रतिकर योजना’ के तहत समुचित आर्थिक मुआवजा प्रदान करने के कड़े निर्देश जारी किए हैं।

⚖️ पीड़ित पक्ष असंतुष्ट, न्याय हेतु राजस्थान उच्च न्यायालय (High Court) में करेगा अपील

अदालत के फैसले के उपरांत पीड़ित पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता अब्दुल सलीम अंसारी ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की।

उन्होंने कहा कि वे न्यायिक प्रक्रिया का पूरा सम्मान करते हैं, परंतु इस फैसले से पीड़ित परिवार और समाज बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय केवल अदालती फाइलों पर मिलना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि पीड़ित वर्ग को न्याय धरातल पर महसूस होना भी परम आवश्यक है। पीड़ित पक्ष इस निर्णय के विरुद्ध शीघ्र ही राजस्थान उच्च न्यायालय (High Court) में अपील याचिका दायर करेगा।