नगर निगम भोपाल में नियमों की धज्जियां: संविदा और कनिष्ठ कर्मियों को सौंपे जा रहे मलाईदार पद लोकायुक्त जांच के दायरे में आए दागियों को अहम विंग की कमान, योग्य और वरिष्ठ अधिकारी दरकिनार
विशेष संवाददाता, शाहिद इकबाल भोपाल। नगर निगम भोपाल एक बार फिर अपनी वित्तीय अनियमितताओं और नियम-विरुद्ध पदोन्नतियों (Out-of-turn Promotions) को लेकर सुर्खियों में है। निगम में ‘प्रभार संस्कृति’ इस कदर हावी हो चुकी है कि योग्यता और वरिष्ठता को पूरी तरह ताक पर रखकर कनिष्ठ, संविदा और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों तक को ऊंचे प्रशासनिक व वित्तीय शक्तियों वाले पदों का प्रभार सौंप दिया गया है।
हाल ही में सामने आए मामले प्रशासनिक विसंगतियों की गवाही दे रहे हैं। शासकीय नियमों के विपरीत, कंप्यूटर शाखा जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीकी विंग की कमान एक संविदा कर्मी शिव कुमार सिंह तोमर को सौंप दी गई है। इसी तरह, अतिक्रमण शाखा के सुरक्षा अधिकारी के रूप में महेश गौहर को जिम्मेदारी दी गई है। सबसे हैरान करने वाला मामला तकनीकी विंग का है, जहां मूल रूप से उपयंत्री (Sub-Engineer) आर.के. त्रिवेदी को न केवल कार्यपालन यंत्री (Executive Engineer) का बड़ा प्रभार दिया गया, बल्कि उन्हें स्वच्छ भारत मिशन, सीवेज प्रकोष्ट और वर्तमान में जल कार्य विभाग जैसे सबसे भारी बजट वाले विभागों की चाबी सौंप दी गई है।
दागियों पर मेहरबानी, जांच एजेंसियां हैरान चौंकाने वाली बात यह है कि जो अधिकारी भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में जांच एजेंसियों के रडार पर हैं, उन्हें लूप-लाइन में भेजने के बजाय और अधिक संवेदनशील विभागों का रजिस्ट्रार व प्रभारी बनाया जा रहा है। कर्मकार मंडल घोटाले और संबल योजना फर्जीवाड़े में करोड़ों रुपये के गबन के आरोपी जोनल अधिकारियों और वार्ड प्रभारियों से जहां एक तरफ वसूली चल रही है, वहीं दूसरी तरफ उन पर मेहरबानी बरसी जा रही है।
लोकायुक्त में वर्ष 2019 से भ्रष्टाचार का प्रकरण दर्ज होने के बावजूद, मूल रूप से राजस्व निरीक्षक मयंक जाट को विवाह पंजीयन विभाग का रजिस्ट्रार बना दिया गया। वहीं, कर्मकार मंडल घोटाले के दागी तत्कालीन जोनल अधिकारी सत्य प्रकाश बड़वैया को जन्म-मृत्यु शाखा जैसी संवेदनशील विंग का रजिस्ट्रार नियुक्त किया गया है।
शीर्ष अधिकारियों की चुप्पी पर सवाल हैरत की बात है कि कमिश्नर और अपर आयुक्त स्तर के शीर्ष अधिकारियों के हस्ताक्षर से ये विवादित आदेश जारी हो रहे हैं। कनिष्ठ व संविदा कर्मियों को न केवल रसूखदार पद दिए गए, बल्कि नियमावली के विपरीत उन्हें चार पहिया शासकीय वाहन जैसी वीआईपी सुविधाएं भी मुहैया कराई जा रही हैं। सूत्रों की मानें तो ऐसे 15 से अधिक संदिग्ध नाम हैं, जो इस व्यवस्था का लाभ उठा रहे हैं। शासन के नियमों को ताक पर रखकर योग्य अधिकारियों का हक मारने वाले इस पूरे नेक्सस की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच समय की मांग है।