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Jaisamand Lake Crisis: एशिया की दूसरी सबसे बड़ी झील में मत्स्य उत्पादन ठप; 2500 परिवारों की रोजी-रोटी पर संकट

उदयपुर: एशिया की दूसरी सबसे बड़ी कृत्रिम मीठे पानी की झील ‘जयसमंद’ आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से जूझ रही है। कभी प्रतिदिन 45 से 50 क्विंटल मछली उत्पादन का केंद्र रही यह झील आज महज 60 से 80 किलो उत्पादन तक सिमट गई है। मत्स्य उत्पादन में आई इस भीषण गिरावट ने क्षेत्र के करीब 2,500 मछुआरा परिवारों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है।

🐟 विलुप्त हो रही दुर्लभ प्रजातियां

मछुआरों के अनुसार, झील में कभी 42 विभिन्न प्रजातियों की मछलियां पाई जाती थीं, जिनमें महाशीर, कालबोस, ममोला और पीटार जैसी महत्वपूर्ण प्रजातियां शामिल थीं, जो अब लगभग गायब हो चुकी हैं। एक समय था जब झील से 35-40 किलो तक की मछलियां आसानी से मिल जाती थीं, लेकिन अब 7-8 किलो की मछली पकड़ने के लिए भी मछुआरों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है।

⛵ घटती नावें, गहराता आर्थिक संकट

उत्पादन घटने का सीधा असर रोजगार पर पड़ा है। जो झील पहले 1,200 से 1,500 नावों की हलचल से गुलजार रहती थी, आज वहां महज 15 से 20 नावें ही नजर आती हैं। आजीविका छिनने के कारण बड़ी संख्या में मछुआरे दूसरे जलाशयों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। 23 मत्स्य उत्पादक सहकारी समितियां इसे प्रबंधन की विफलता मान रही हैं।

📋 समितियां कर रहीं ‘राजसंघ मॉडल’ की मांग

मछुआरा समितियों का आरोप है कि वर्ष 2006 में मत्स्य विभाग के अधीन संचालन आने के बाद से स्थिति बिगड़ी है। उन्होंने मांग की है कि 1977 से 2005 तक सफल रहे ‘जनजाति क्षेत्र विकास सहकारी संघ (राजसंघ) मॉडल’ को फिर से लागू किया जाए। उन्होंने पर्याप्त मात्रा में ‘मत्स्य बीज’ नहीं छोड़े जाने और झील में फैली जलीय घास को भी मुख्य कारणों में से एक बताया है।

🏛️ प्रशासन का रुख

महाराणा जयसिंह द्वारा निर्मित इस झील में जल भंडारण क्षमता 14,550 एमसीएफटी है। इस पूरे मामले पर जनजाति मंत्री बाबूलाल खराड़ी ने कहा कि वे मामले की जानकारी लेकर जल्द ही आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करेंगे।