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Regional Parties vs Congress: क्षेत्रीय दलों में टूट का किसे मिलेगा फायदा? भारतीय राजनीति में कांग्रेस की वापसी की नई उम्मीदें

देश की राजनीति में एक बार फिर क्षेत्रीय दलों के भविष्य को लेकर बहस छिड़ गई है। एनसीपी, शिवसेना और टीएमसी जैसे दलों में जारी आंतरिक कलह और टूट ने सियासी पंडितों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। सवाल यह है कि यदि क्षेत्रीय दल कमजोर होते हैं, तो इसका ‘गेम-चेंजर’ फायदा किसे मिलेगा—कांग्रेस को या भाजपा को?

📈 कांग्रेस के लिए क्या हैं अवसर?

वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री के अनुसार, यदि क्षेत्रीय दलों का जनाधार खिसकता है, तो एक राष्ट्रीय विपक्ष के तौर पर कांग्रेस स्वाभाविक रूप से विकल्प बन सकती है। तेलंगाना में बीआरएस और कर्नाटक में जेडीएस की कमजोरी ने पहले ही कांग्रेस को लाभ पहुँचाया है। कांग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक का मानना है कि हर दल खुद को मजबूत करने की कोशिश करता है और कांग्रेस भी अपनी जमीनी पकड़ को और अधिक आक्रामक तरीके से बढ़ा रही है।

🧩 गठबंधन और विलय का सधा हुआ रुख

कांग्रेस की रणनीति अब ‘दादागिरी’ के बजाय ‘समन्वय’ की दिख रही है। संगठन महासचिव ने स्पष्ट संदेश दिया है कि जो दल पहले कांग्रेस छोड़कर गए थे, यदि वे अब विलय करना चाहते हैं, तो उनका स्वागत है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन इस बात का संकेत है कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को पूरी तरह दरकिनार करने के बजाय उन्हें साथ लेकर चलने की नीति पर काम कर रही है।

⚖️ क्या क्षेत्रीय दल पूरी तरह अप्रासंगिक हो गए हैं?

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि तस्वीर इतनी सरल नहीं है। क्षेत्रीय दलों की टूट कांग्रेस के लिए एक अवसर जरूर पैदा कर सकती है, लेकिन कांग्रेस की वास्तविक मजबूती केवल दूसरों की कमजोरी पर नहीं, बल्कि उसके खुद के संगठन, नेतृत्व की स्पष्टता और राज्यों में जनाधार बढ़ाने की क्षमता पर निर्भर करेगी। यदि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला बनता है, तो भाजपा को भी इसका लाभ मिल सकता है।