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Malnutrition in MP: सरकारी दावों की खुली पोल; NFHS-6 रिपोर्ट में मध्य प्रदेश में कुपोषण का स्तर बढ़ा, बढ़ी चिंता

भोपाल: मध्य प्रदेश सरकार कुपोषण को जड़ से मिटाने के लिए हर साल हजारों करोड़ रुपये का बजट आवंटित करती है। ‘सक्षम आंगनबाड़ी एवं पोषण 2.0’ जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं के बावजूद, ताजा ‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण’ (NFHS-6) की रिपोर्ट प्रदेश की एक चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। यह रिपोर्ट सरकारी योजनाओं की कार्यप्रणाली और उनकी प्रभावशीलता पर बड़े सवाल खड़े करती है।

📊 बढ़ते कुपोषण के आंकड़े: एक नज़र

नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि पिछले चार वर्षों में कुपोषण के संकेतकों में सुधार के बजाय गिरावट आई है:

  • तीव्र कुपोषण (वेस्टिंग): यह 18.9% से बढ़कर 23.8% हो गया है, जो राष्ट्रीय औसत (19.3%) से कहीं अधिक है।

  • अंडरवेट (कम वजन): बच्चों के कम वजन का प्रतिशत 33% से बढ़कर 39.7% पर पहुंच गया है, जिससे प्रदेश इस मामले में देश में दूसरे स्थान पर आ गया है।

  • गंभीर वेस्टिंग: यह भी 6.5% से बढ़कर 6.8% हो गई है।

🌱 ठिगनेपन (स्टंटिंग) में सुधार, फिर भी राह मुश्किल

रिपोर्ट का केवल एक पहलू सकारात्मक है—स्टंटिंग (ठिगनापन) का स्तर 35.7% से घटकर 31.4% हो गया है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि हर तीन में से एक बच्चा अभी भी ठिगनेपन का शिकार है, जो लंबे समय तक पोषण की कमी को दर्शाता है। वेस्टिंग और अंडरवेट में वृद्धि यह बताती है कि बच्चे वर्तमान में भी गंभीर पोषण संकट से जूझ रहे हैं।

💸 खर्च हजारों करोड़, परिणाम शून्य क्यों?

मध्य प्रदेश सरकार हर साल पोषण अभियान पर करीब 6,000 करोड़ रुपये खर्च करती है। सवाल यह है कि यदि बजट का इतना बड़ा हिस्सा योजनाओं पर जा रहा है, तो धरातल पर बदलाव क्यों नहीं दिख रहा? विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बजट बढ़ाना काफी नहीं है; योजनाओं का सही क्रियान्वयन, जमीनी स्तर पर निगरानी (Monitoring) और लाभार्थियों तक गुणवत्तापूर्ण भोजन की पहुंच सुनिश्चित करना अनिवार्य है।

🏥 एनआरसी (NRC) से घर तक: पोषण चक्र की विफलता

पोषण पुनर्वास केंद्रों (NRC) से स्वस्थ होकर लौटने वाले 10 से 20 प्रतिशत बच्चे दोबारा कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। इसका मुख्य कारण परिवार और समुदाय स्तर पर पोषण का अभाव है। यदि अस्पताल से लौटने के बाद बच्चे को घर पर पर्याप्त और पौष्टिक भोजन नहीं मिल पा रहा, तो अस्पताल का उपचार अधूरा रह जाता है। यह स्पष्ट करता है कि कुपोषण एक ‘सामुदायिक समस्या’ है, जिसका समाधान केवल केंद्रों के भीतर नहीं, बल्कि परिवारों के रसोईघर तक पहुंचना चाहिए।