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बेटे की मौत के बाद पिता का ‘महादान’! हरीश राणा के अंगदान की इच्छा; जानें इस नेक कदम पर क्या कह रहे हैं बड़े डॉक्टर्स

सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की मंजूरी मिलने के बाद हरीश राणा दिल्ली एम्स के पैलिएटिव केयर विभाग में हैं. जहां कई डॉक्टरों उनकी निगरानी कर रहे हैं. हरीश की इच्छामृत्यु की प्रक्रिया चल रही है. वह तो अचेतन अवस्था में हैं, लेकिन पैरेंट्स गहरी पीड़ा से गुजर रहे हैं. इसके बावजूद उन्होंने उम्मीदें नहीं छोड़ी हैं. उनका सपना है कि बेटा शरीर भले ही त्याग दे लेकिन उसके अंग दूसरे जरूरतमद मरीजों को दे दिए जाएं जिससे उन्हें लगे कि उनका बेटा जीवन देकर भी जिंदा है.हालांकि सवाल कई हैं, अड़चनें भी हैं, लेकिन उनके संघर्षों को देखते हुए कभी-कभी ये बेमानी लगते हैं.

हरीश राणा के पिता ने बेटे के अंगदान की इच्छी जताई है. हरीश 13 सालों से कोमा में हैं, तो क्या कोमा में रहने से शरीर के अंगों पर असर पड़ता है? क्या इस तरह के मरीज के अंगदाना के लिए फिट होते हैं? इस बारे में एक्सपर्ट्स की राय जानते हैं.

दिल्ली के जीटीबी हॉस्पिटल में मेडिसिन विभाग में डॉ. अजीत कुमार बताते हैं कि इच्छामृत्यु पाने वाले हरीश जब इस दुनिया को अलविदा कह देंगे तो उनके ऑर्गन डोनेशन की प्रक्रिया शुरू होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि वह ब्रेन डेड नहीं बल्कि कोमा के मरीज हैं. कोमा के मरीज के अंगों की स्थिति कई फैक्टर्स पर निर्भर करती है. जैसे मरीज के अंग कितने फिट हैं, रिजेक्शन रेट का रिस्क कितना है. कोई ऑर्गन फेल होने की कगार पर तो नहीं हैं. ये सभी चीजें देखी जाती हैं. कोमा वाले मरीज के सभी अंग ट्रांसप्लांट के लिए फिट हों ये भी ऑर्गन की स्क्रीनिंग के बाद ही पता चल पाता है.

कोमा के मरीज और सामान्य ब्रेन डेड व्यक्ति के अंगों में क्या कुछ अंतर है?

डॉ कुमार कहते हैं कि एक सामान्य ब्रेड व्यक्ति और कोमा के मरीज के अंगों में अंतर हो सकता है. जैसे अगर कोई व्यक्ति फिट है और उसकी मौत अचानक किसी सड़क हादसे में हो गई और उसके अंग डोनेशन के लिए किसी दूसरे मरीज में ट्रांसप्लांट किए जाते हैं तो उम्मीद होती है कि अंग फिट होंगे और रिजेक्शन रेट कम होगा.

दूसरी तरफ कोमा के मरीज के अंग पूरी तरह फिट हो भी सकते हैं और नहीं भी. ये कई चीजों पर निर्भर करता है. जैसे कोमा के मरीज मेंबार-बार इंफेक्शन होने की आशंका रहती है. जिससे लिवर और किडनी पर असर पड़ता है. हालांकि कोमा के मरीज मेंकॉर्निया (आंख) कुछ टिश्यू ( स्किन) ये फिट होते हैं और इनका दान हो सकता है, लेकिन सभी चीजें पूरी तरह मेडिकल जांच पर निर्भर करती हैं.

डॉ कुमार के मुताबिक, कोमा का मरीज हो या सामान्य व्यक्ति मेडिकल के लिहाज सेहर केस अलग होता है, इसलिए अंतिम फैसला मेडिकल टीम ही लेती है.

इस बारे में दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में पूर्व डॉ. दीपक सुमन बताते हैं कि देश में अंगदान को लेकर सख्त कानूनी गाइडलाइंस हैं. यह पूरी प्रक्रिया नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (NOTTO – नोटो) की देखरेख में होती है. इसके लिए मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994 के तहत देश में अंगदान और ट्रांसप्लांट को लेकर नियम तय किए गए हैं. अंग तभी लिए जाते हैं जब व्यक्ति का निधन हो जाए या फिर डॉक्टर उसको ब्रेन डेड घोषित कर दें.इसके बाद ही परिवार की सहमति से अंगदान की प्रक्रिया आगे बढ़ती है.

डॉ दीपक कहते हैं कि हरीश राणा के मामले में उनके पिता की भावनाओं और गरिमा का सम्मान करना जरूरी है. एक पिता का अपने बेटे के जरिए दूसरों को जीवन देने का विचार बहुत ही अच्छा है, लेकिन मेडिकल गाइडलाइंस के मुताबिक ही सभी काम किया जाते हैं.

एम्स में भर्ती हैं हरीश राणा

हरीश राणा एम्स में हैं और 10 सदस्यों के डॉक्टरों की टीम उनकी निगरानी कर रही है. हरीश की इच्छामृत्यु की प्रक्रिया के तहत उनका पोषण धीरे -धीरे कम किया जा रहा है. उनको एम्स में किसी वेंटिलेटर या आईसीयू सपोर्ट में नहीं रखा गया है. उनकी कुछ दवाएं चल रही हैं जो दर्द को कम करती हैं और शरीर के लिए जरूरी हैं. एम्स प्रशासन ने मनोचिकित्सकों की एक टीम भी बनाई है. जो हरीश के परिजनों की काउंसलिंग कर रही है. ये सब हरीश के परिवार को मानसिक रूप से तैयार करने के लिए किया जा रहा है, ताकि उनके परिजन इस दुख को सहन कर सकें