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अग्नि और सूर्य की साक्षी में महाकाल मंदिर में 17 फरवरी से शिव नवरात्र

 उज्जैन। शिव आराधना का महापर्व शिव नवरात्र 17 फरवरी को आरंभ होगा। मंगलवार के दिन गण्ड उपरांत वृद्धि योग की संयुक्त बेला में शुरू हो रहा पर्व नौ के बजाय 10 दिस दिन का रहेगा। विशेष यह है कि गण्ड योग के अधिपति अग्नि तथा वृद्धि योग के देवता सूर्य कहे गए हैं।

अग्नि व सूर्य शिव के नेत्र कहे गए हैं। इसलिए इनकी साक्षी में देवाधिदेव की पूजा मनोवांछित फल प्रदान करने वाली मानी गई है। नवरात्र के 10 दिन विशिष्ट योग नक्षत्र में पार्थिव शिवलिंग की पूजा भी शुभ मानी गई है। पंचांगीय गणना व धर्मशास्त्र के निर्देशों का पालन कर शिव पूजा का लाभ लिया जा सकता है।

ज्योतिषाचार्य पं. अमर डब्बावाला ने बताया फाल्गुन कृष्ण पंचमी से त्रयोदशी तक नौ दिन शिवनवरात्र उत्सव मनाया जाता है। 12 ज्योतिर्लिंगों में महाकाल एकमात्र ज्योतिर्लिंग है, जहां शिवनवरात्र के रूप में महाशिवरात्रि मनाई जाती है। इसलिए अवंतिका तीर्थ में शिव नवरात्र के पूजन की विशेष मान्यता है।

इन नौ दिनों में विधि विधान से शिव पूजा करने से मनुष्य के मानसिक, कायिक व वाचिक पापों का नाश होकर सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस बार 17 से 26 फरवरी तक शिवनवरात्र उत्सव मनाया जाएगा। इन 10 दिनों में विशेष योग संयोग की साक्षी रहेगी। इसमें पूजन तथा साधना उपासना का संपूर्ण उल्लेख शिव महापुराण में दिया गया है।

तिथि वृद्धि के चलते 10 दिन के नवरात्र

भगवान शिव की विशिष्ट व काम्य पूजा रात्रि में की जाती है। इसलिए शिव नवरात्र में तिथि की गणना अहोरात्र के अनुसार की जाती है। यही कारण है, इस बार नवरात्र 10 दिन के रहेंगे। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस कालखंड में अगर रात्रि के समय मात्र 24 मिनट भी साधना कर ली जाए तो ईश्वर की कृपा हो जाती है।

वर्ण अनुसार बनाएं मिट्टी के शिवलिंग

सांसारिक जीवन में दुख, कष्ट, व्याधि, पीड़ा अपमृत्यु के दोष से मुक्त होने के लिए पार्थिव शिवलिंग की पूजा करना चाहिए। इसका उल्लेख शिव महापुराण की विद्येश्वर संहिता में मिलता है। अगर चार वर्ण के अनुसार अलग-अलग रंग की मिट्टी से शिवलिंग का निर्माण कर पूजा अर्चना की जाए तो अधिक फल प्राप्त होता है।

अर्थात ब्राह्मण को सफेद मिट्टी, क्षत्रियों को लाल मिट्टी, वैश्य को पीली मिट्टी और अन्य को काली मिट्टी से पार्थिव शिवलिंग का निर्माण करके पूजन करना चाहिए। पूजा तीर्थ, शिवालय अथवा देवालय या पवित्र स्थान पर ही की जानी चाहिए।