Jharkhand Tribal Empowerment: मोटे अनाज से बदलेगी आदिवासी महिलाओं की तकदीर; SBI और CSIR-CIMFR लेडीज क्लब आए साथ
धनबाद। देश के प्रतिष्ठित शोध संस्थान सीएसआईआर-सिंफर (CSIR-CIMFR) के वैज्ञानिक जहां नवाचारों के जरिए देश के विकास में योगदान दे रहे हैं, वहीं संस्थान का लेडीज क्लब सामाजिक सरोकार के तहत आदिवासी महिलाओं को स्वास्थ्य, पोषण और स्वावलंबन से जोड़ने की सराहनीय पहल कर रहा है।
इस अभियान के तहत ग्रामीण व वनवासी महिलाओं को मिलेट्स (मोटे अनाज) के पोषक तत्वों और स्वास्थ्य लाभों की जानकारी देने के साथ-साथ इनसे विभिन्न प्रकार के आधुनिक खाद्य उत्पाद तैयार करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। खास बात यह है कि स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध मिलेट्स को स्वरोजगार का जरिया बनाने की दिशा में भी मार्गदर्शन किया जा रहा है।
🍪 पारंपरिक भोजन से आगे आधुनिक खाद्य उत्पाद: रागी, बाजरा, महुआ से बनेंगे कुकीज, केक और लड्डू
रागी, बाजरा, ज्वार, मक्का और तिल जैसे मोटे अनाज आदिवासी इलाकों में लंबे समय से खान-पान का हिस्सा रहे हैं।
किंतु इनका उपयोग केवल पारंपरिक रोटी तक सीमित न रहे, बल्कि इन्हें आधुनिक पौष्टिक व्यंजनों के रूप में विकसित किया जाए, इसी सोच के साथ लेडीज क्लब ने यह पहल शुरू की है। क्लब की अध्यक्ष मीरा मिश्रा के अनुसार, “महिलाएं परिवार की देखरेख में जुटी रहती हैं, लेकिन अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नहीं हो पातीं। हमारी कोशिश है कि उन्हें बताया जाए कि रोजमर्रा के भोजन में पौष्टिक तत्वों को कैसे शामिल करें।”
वहीं, क्लब की सचिव व मिलेट उत्पाद प्रशिक्षक नंदिता सिंह ने महिलाओं को रागी, बाजरा, ज्वार के साथ स्थानीय महुआ और मोरिंगा का उपयोग कर लड्डू, कुकीज, बिस्किट और केक बनाने का प्रशिक्षण दिया। साथ ही, चीनी के स्थान पर खजूर, किशमिश और शहद जैसे प्राकृतिक विकल्पों का उपयोग सिखाया गया।
🥗 पोषण सुधार के साथ स्वास्थ्य जागरूकता: क्लीनिकल न्यूट्रिशनिस्ट ने बताए balanced diet के फायदे
मिलेट्स से बने उत्पादों की सबसे बड़ी खासियत उनका उच्च पोषण मूल्य है।
कार्यक्रम में शामिल क्लीनिकल न्यूट्रिशनिस्ट मनीषा मीनू ने महिलाओं को संतुलित आहार की उपयोगिता समझाई। उन्होंने बताया कि रागी और बाजरा जैसी चीजें आसपास आसानी से मिल जाती हैं। इनका सही उपयोग महिलाओं, बच्चों और परिवार के बुजुर्गों के पोषण स्तर में क्रांतिकारी सुधार ला सकता है।
💼 घर से ही छोटे कारोबार की शुरुआत: कम लागत में स्वरोजगार और वित्तीय आजादी का मार्ग
स्वास्थ्य जागरूकता के साथ-साथ इस पहल का प्रमुख ध्येय महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है।
रागी से केक और तिल व महुआ से लड्डू बनाकर महिलाएं अपने घर से ही छोटे स्तर पर बेकरी या खाद्य सामग्री का कारोबार शुरू कर सकती हैं। अध्यक्ष मीरा मिश्रा ने बताया कि स्वरोजगार के लिए किसी बड़े निवेश की आवश्यकता नहीं होती; स्थानीय कच्चे माल से शुरुआत करके धीरे-धीरे स्थानीय बाजारों तक पहुंच बनाई जा सकती है। प्रशिक्षक नंदिता सिंह (जो स्वयं अपनी बेकरी संचालित करती हैं) ने कहा कि महिलाएं इस हुनर को सीखकर व्यावसायिक रूप से आगे बढ़ सकती हैं।
🏦 एसबीआई का मिला साथ: बैंकिंग सहायता और CSR के तहत हर संभव मदद का भरोसा
इस पहल को वित्तीय और सामाजिक संबल प्रदान करने के लिए भारतीय स्टेट बैंक (SBI) भी आगे आया है।
कार्यक्रम में उपस्थित एसबीआई के डीजीएम प्रफुल्ल कुमार झा ने महिलाओं को आश्वस्त किया कि स्वरोजगार शुरू करने के लिए किसी भी प्रकार की बैंकिंग सुविधा या वित्तीय सहायता की आवश्यकता होने पर बैंक कंधे से कंधा मिलाकर मदद करेगा। साथ ही, कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) के तहत सामाजिक दायित्वों को निभाने के लिए बैंक आगे भी ऐसे कार्यक्रमों का समर्थन करता रहेगा।
✨ आदिवासी महिलाओं के लिए नया अनुभव: पारंपरिक ज्ञान को मिला आधुनिक दिशा
प्रशिक्षण में भाग लेने वाली आदिवासी महिलाओं के लिए यह अनुभव अत्यंत उपयोगी रहा।
महिलाओं ने बताया कि आसपास मौजूद खाद्य सामग्रियों के ऐसे आधुनिक और व्यावसायिक इस्तेमाल की जानकारी उन्हें पहली बार मिली है। इस प्रशिक्षण से न केवल उनके परिवार के स्वास्थ्य में सुधार होगा, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने और अतिरिक्त आय अर्जित करने का एक मजबूत जरिया भी मिल गया है।