चंडीगढ़: चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड (CSCL) और नगर निगम चंडीगढ़ से जुड़े 117 करोड़ रुपये के बहुचर्चित बैंक धोखाधड़ी मामले में IDFC फर्स्ट बैंक ने ₹5.75 करोड़ के अंतिम समझौते (फाइनल सेटलमेंट) का औपचारिक प्रस्ताव पेश किया है।
बैंक प्रबंधन का दावा है कि वित्तीय गड़बड़ी उजागर होते ही उसने ब्याज सहित कुल 121.24 करोड़ रुपये की मूल धनराशि नगर निगम को पूर्व में ही वापस कर दी है। दूसरी ओर, इस पूरे अंतरराज्यीय वित्तीय फर्जीवाड़े की विस्तृत जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा की जा रही है।
🏦 87 बार फर्जी ट्रांजेक्शन और FDRs में हेरफेर: 1 साल तक चला गबन का खेल
घोटाले की कार्यप्रणाली और समय-सीमा:
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वारदात की अवधि: यह बड़ा बैंक घोटाला मुख्य रूप से 19 सितंबर 2024 से 1 सितंबर 2025 के बीच योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया।
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शाखा प्रबंधक की मिलीभगत: आरोप है कि बैंक के तत्कालीन शाखा प्रबंधक ने बाहरी जालसाजों के साथ साठगांठ करके इस गोरखधंधे की पटकथा रची।
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अवैध निकासी: सेक्टर-32 स्थित शाखा से स्मार्ट सिटी लिमिटेड और नगर निगम के आधिकारिक बैंक खातों से करीब 87 बार अवैध ट्रांसफर और फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदों (FDRs) में हेराफेरी कर करोड़ों रुपये पार किए गए।
🏗️ शहर के बुनियादी विकास के लिए रखा गया था फंड: ट्रांसफर प्रक्रिया में खुली पोल
फंड का उद्देश्य और खुलासे का घटनाक्रम:
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विकास कार्यों का बजट: यह भारी-भरकम राशि चंडीगढ़ स्मार्ट सिटी लिमिटेड द्वारा केंद्र और राज्य प्रायोजित विकास परियोजनाओं के लिए सुरक्षित रखी गई थी।
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निगम को हस्तांतरण: प्रशासनिक योजना के तहत इस मद से आवश्यक धनराशि नगर निगम चंडीगढ़ के खातों में ट्रांसफर की जानी थी।
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फरवरी-मार्च 2026 में भंडाफोड़: जब स्मार्ट सिटी के खाते से नगर निगम के खाते में वास्तविक फंड ट्रांसफर की प्रक्रिया शुरू हुई, तब खाते में रकम गायब मिली और इस महाघोटाले की परतें खुलती चली गईं।
📄 11 फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदें पाई गईं फर्जी: हूबहू असली जैसी दिखती थीं रसीदें
दस्तावेजों में जालसाजी का स्तर:
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सघन ऑडिट में खुलासा: जांच और ऑडिट के दौरान जब बैंक रिकॉर्ड में दर्ज एफडीआर का मिलान किया गया, तो 11 फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदें पूरी तरह कूटरचित (फर्जी) पाई गईं।
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पहचानना था मुश्किल: ये फर्जी रसीदें देखने में बिल्कुल मूल दस्तावेजों जैसी प्रतीत होती थीं, इसी कारण लंबे समय तक वित्तीय लेखा परीक्षकों या अधिकारियों को किसी प्रकार के गबन का अंदेशा नहीं हुआ।
⚖️ BNS की गंभीर धाराओं में केस दर्ज: EOW के बाद CBI को सौंपी गई जांच
कानूनी कार्रवाई और लागू धाराएं:
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EOW की प्राथमिकी: शुरुआत में चंडीगढ़ पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4) (धोखाधड़ी), 338, 336(3), 340(2), 61(2) और 316(5) के तहत मुकदमा पंजीकृत किया था।
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गंभीर विधिक आरोप: इन धाराओं में आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और आपराधिक षड्यंत्र जैसे संगीन आरोप शामिल हैं।
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CBI को सुपुर्द: घोटाले के वित्तीय दायरे और अंतरराज्यीय कड़ियों को देखते हुए बाद में यह पूरा मामला केंद्रीय जांच एजेंसी (CBI) को सौंप दिया गया।
🔍 केवल एक व्यक्ति का काम नहीं: बैंक अफसरों और निगम कर्मियों पर CBI का शिकंजा
जांच का दायरा और अंदरूनी मिलीभगत:
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संगठित सिंडिकेट का संदेह: केंद्रीय जांच एजेंसी का स्पष्ट मानना है कि 117 करोड़ रुपये का इतना बड़ा फर्जीवाड़ा कोई अकेला व्यक्ति अंजाम नहीं दे सकता।
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वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका: सीबीआई इस समय बैंक के अन्य उच्चाधिकारियों, लेखा विभाग के कर्मियों और नगर निगम चंडीगढ़ के संबंधित कर्मचारियों की सांठगांठ की गहनता से पड़ताल कर रही है।
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विस्तृत धरपकड़ की तैयारी: जांच एजेंसी यह स्थापित करने में जुटी है कि फर्जी एफडीआर जारी करने और सत्यापन प्रक्रियाओं को नजरअंदाज करने के एवज में किन-किन लोगों ने वित्तीय लाभ प्राप्त किया।