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जानिए क्या है गुरुद्वारा लंगर की पावन परंपरा, जहां एक ही पंगत में मिट जाती हैं जाति, धर्म और अमीरी-गरीबी की दूरियां

अमृतसर (पंजाब): गुरुद्वारे में जब श्रद्धालु एक साथ जमीन पर बैठकर भोजन ग्रहण करते हैं, तो वहां किसी व्यक्ति की जाति, धर्म, अमीरी या सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं देखी जाती। सभी लोग एक ही पंगत (पंक्ति) में एक साथ बैठकर एक समान भोजन ग्रहण करते हैं। सिख धर्म की यह पवित्र परंपरा संपूर्ण विश्व में निष्काम सेवा, समानता और वसुधैव कुटुंबकम के साथ भाईचारे का अद्वितीय संदेश देती है। इसे ‘लंगर’ कहा जाता है। लंगर केवल निःशुल्क भोजन कराने की व्यवस्था मात्र नहीं है, बल्कि इसके मूल में सर्वजन समभाव और इंसानियत की अत्यंत गूढ़ भावना समाहित है। माना जाता है कि इस लोक कल्याणकारी परंपरा को सिख धर्म के संस्थापक प्रथम गुरु, गुरु नानक देव जी ने आगे बढ़ाया था। उन्होंने समाज को जात-पात, छुआछूत और ऊंच-नीच के भेदभाव से परे हटकर एक-दूसरे की निस्वार्थ सेवा करने की प्रेरणा दी।

🍲 क्या है लंगर की अवधारणा? पंगत में बैठकर भोजन करने की क्यों है परंपरा

सिख धर्म के गुरुद्वारों में सभी श्रद्धालुओं एवं आगतों के लिए सामूहिक निःशुल्क भोजन की व्यवस्था की जाती है, जिसे लंगर कहा जाता है।

लंगर कक्ष में कोई भी व्यक्ति बिना किसी पूर्वाग्रह के प्रविष्ट होकर भोजन ग्रहण कर सकता है। भोजन वितरण के दौरान सभी लोग एक साथ फर्श पर बिछी पंगत में बैठते हैं और सभी को एक समान प्रसाद रूपी भोजन परोसा जाता है। इस व्यवस्था की सबसे अनुपम विशेषता यह है कि भोजन करने वाले व्यक्ति की सामाजिक अथवा आर्थिक हैसियत का कोई महत्व नहीं रहता; राजा हो या रंक, सब एक साथ बैठकर प्रसाद छकते हैं।

✨ गुरु नानक देव जी के बाल्यकाल की ‘सच्चा सौदा’ साखी, जिससे पड़ी लंगर परंपरा की नींव

लंगर की शुरुआत से जुड़ी एक अत्यंत प्रसिद्ध एवं प्रामाणिक साखी गुरु नानक देव जी के बचपन से संबद्ध है।

सिख धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनके पिता मेहता कालू जी ने उन्हें व्यापार की व्यावहारिक शिक्षा देने हेतु कुछ मुद्राएं (धन) प्रदान की थीं और कहा था कि इन पैसों से बाजार जाकर कोई लाभदायक ‘खरा सौदा’ करके लौटें। गुरु नानक देव जी जब मार्ग में जा रहे थे, तो उन्हें कुछ भूखे साधु और अत्यंत निर्धन लोग मिले। उनकी व्यथा देखकर गुरु नानक जी ने व्यापार में लाभ कमाने के स्थान पर उन संपूर्ण पैसों से भोजन सामग्री क्रय की और भूखे लोगों को तृप्त होकर भोजन कराया। सिख इतिहास में इसी पावन घटना को ‘सच्चा सौदा’ के रूप में स्मरण किया जाता है। गुरु नानक देव जी के दृष्टिकोण में किसी भूखे-प्यासे जीव को भोजन कराना ही जीवन का सबसे सच्चा और बड़ा व्यापार था।

🌾 क्या है ‘वंड छको’ का आध्यात्मिक अर्थ? सिख धर्म के तीन मूल स्तंभ

प्रथम पातशाह गुरु नानक देव जी ने मानव जीवन को सार्थक और श्रेष्ठ बनाने के लिए तीन आधारभूत सिद्धांतों का उपदेश दिया था—‘नाम जपो, कीरत करो और वंड छको’

‘नाम जपो’ का तात्पर्य निरंतर ईश्वर का स्मरण और ध्यान करना है; ‘कीरत करो’ का अर्थ ईमानदारी, निष्ठा व कठिन परिश्रम से अपनी आजीविका अर्जित करना है; तथा ‘वंड छको’ का गूढ़ अर्थ अपनी ईमानदारी की कमाई और भोजन में से जरूरतमंदों व समाज के साथ बांटकर उपभोग करना है। गुरुद्वारे की लंगर परंपरा में इसी ‘वंड छको’ के पावन सिद्धांत का सजीव दर्शन होता है, जहाँ प्रत्येक श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य अनुसार योगदान देता है और सहभोज का आनंद लेता है।

🤝 पंगत में बैठने का सामाजिक संदेश और निस्वार्थ ‘सेवा’ का असीम महत्व

लंगर में सभी वर्गों के लोगों को एक साथ पंगत में बैठाने के पीछे सामाजिक समरसता का महान संदेश निहित है।

मध्यकालीन भारत में जब समाज जातीय संकीर्णताओं और सामाजिक असमानताओं में जकड़ा हुआ था, उस दौर में एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करना तत्कालीन समाज में क्रांति के समान था। पंगत में बैठकर भोजन करने से यह चेतना जागृत होती है कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसकी जाति, धन या पद से नहीं, बल्कि उसके मानव होने से है। इसके साथ ही, लंगर में भोजन पकाने से लेकर, परोसने और उपरांत बर्तन स्वच्छ (मांझने) करने तक का संपूर्ण कार्य श्रद्धालु स्वेच्छा से करते हैं। यहाँ बड़े से बड़े प्रशासनिक पद या धन-वैभव से संपन्न व्यक्ति भी साधारण सेवादार की भांति विनम्रतापूर्वक झाड़ू लगाने, सब्जियां काटने व रोटियां बेलने की सेवा करते हैं।

🌍 किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं लंगर, अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में चलता है विश्व का सबसे बड़ा लंगर

गुरुद्वारे के लंगर की सबसे सुंदर पक्ष यह है कि यह किसी विशिष्ट धर्म, संप्रदाय या वर्ग तक सीमित नहीं है।

संसार के किसी भी कोने में स्थित गुरुद्वारे के द्वार प्रत्येक धर्म, नस्ल और देश के नागरिक के लिए सदैव खुले रहते हैं। भारत में सबसे विशाल और ऐतिहासिक लंगर अमृतसर स्थित श्री हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) में निरंतर संचालित होता है। यहाँ की विशाल रसोइयों में प्रतिदिन औसतन 50,000 से 1,00,000 श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं। वहीं, गुरुपर्व, रविवार और विशेष धार्मिक अवसरों पर यह संख्या बढ़कर 1.5 लाख से 2 लाख तक पहुंच जाती है, जहाँ चौबीसों घंटे बिना रुके निष्काम सेवा का महायज्ञ चलता रहता है।