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मुजफ्फरनगर: दृष्टिहीन सत्येंद्र की अटूट शिवभक्ति! बिना किसी साथी के लाठी के सहारे 3 दिन में तय किया हरिद्वार का सफर

मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश): सावन के पवित्र महीने में कांवड़ यात्रा के दौरान लाखों शिवभक्तों की आस्था के तरह-तरह के अनुपम रंग देखने को मिलते हैं, परंतु उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जनपद में एक ऐसा अनूठा शिवभक्त पहुंचा है, जिसकी अटूट निष्ठा और भक्ति देखकर हर कोई हतप्रभ है।

मुजफ्फरनगर के बिटावदा गांव के निवासी बुजुर्ग सत्येंद्र जन्मजात दृष्टिहीन हैं। दोनों आंखों की रोशनी न होने के बावजूद भगवान आशुतोष के प्रति उनका समर्पण और भक्ति-भाव तनिक भी डगमगाया नहीं है।

🦯 केवल एक लाठी के सहारे पूरी कर रहे यात्रा, 3 दिन में हरिद्वार से पहुंचे मुजफ्फरनगर

दिव्यांग सत्येंद्र केवल एक साधारण लाठी के सहारे इस वर्ष अपनी 17वीं कांवड़ यात्रा सफलतापूर्वक पूरी कर रहे हैं।

शारीरिक अक्षमता के बावजूद उनके अंतर्मन में भगवान शिव के प्रति ऐसी श्रद्धा है, जो उन्हें प्रतिवर्ष कांवड़ उठाने का असीम आत्मबल प्रदान करती है। सत्येंद्र ने 2 अगस्त को हरिद्वार स्थित पवित्र हर की पौड़ी से गंगाजल उठाया था। बिना किसी पारिवारिक सदस्य या साथी के, केवल अपनी लाठी टेकते हुए वे मात्र 3 दिनों में हरिद्वार से मुजफ्फरनगर पहुँच गए।

🤝 रास्ते में अनजान कांवड़िए बने साथी, भोलेनाथ का नाम जपते हुए तय किया मार्ग

सत्येंद्र ने बताया कि रास्ते में मिलने वाले अन्य कांवड़िए और राहगीर उनकी स्थिति देखकर स्वयं आगे आते हैं और उन्हें सुरक्षित सड़क पार कराने में सहयोग करते हैं।

सह-यात्री कुछ दूरी तक उनका हाथ पकड़कर दिशा दिखाते हैं और तदुपरांत वे अपनी लाठी के सहारे निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं। कांवड़ मार्ग पर श्रद्धालुओं और स्थानीय निवासियों का यह सहयोग उन्हें कभी एकाकीपन या भय का अहसास नहीं होने देता। पूरे मार्ग में वे निरंतर भगवान शिव के नाम का जाप करते हुए अग्रसर रहते हैं।

💬 “भोलेनाथ जीवन में दें सुख-शांति, कट जाएं पूर्व जन्मों के पाप”: शिवभक्त सत्येंद्र

“मैं बिटावदा गांव का रहने वाला हूँ। मुझे बचपन से आंखों से दिखाई नहीं देता, यह मेरी 17वीं कांवड़ यात्रा है। मैंने 2 अगस्त को हरिद्वार से कांवड़ उठाई थी और 3 दिन में मुजफ्फरनगर पहुंच गया हूँ। मैं कांवड़ इसलिए लाता हूँ ताकि पूर्व जन्मों के पाप धुल जाएं, क्योंकि इंसान को अपने कर्मों का फल तो भुगतना ही पड़ता है। भोलेनाथ से बस यही प्रार्थना है कि जीवन में सुख-शांति दें। मेरे साथ कोई नहीं था, रास्ते में भोलेनाथ ही थोड़ा-थोड़ा सहारा देकर यहां तक लाए हैं।”