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अजब-गजब: रांची के इस स्कूल में सिर्फ 2 बच्चे और 2 शिक्षक, मिड-डे मील का खर्च जारी

झारखंड की राजधानी रांची के थड़पखना में स्थित एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय इन दिनों सुर्खियों में है। राजकीयकृत प्राथमिक विद्यालय हिंदी (थड़पखना) अपनी एक अजीबोगरीब स्थिति को लेकर चर्चा में है। यह बिल्कुल हकीकत है कि इस पूरे स्कूल में केवल 2 बच्चे ही शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन दो बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल में 2 सरकारी शिक्षक नियमित रूप से कार्यरत हैं। इसके बावजूद स्कूल का पूरा सिस्टम (हाजिरी से लेकर रसोइया तक) हर दिन पूरी मुस्तैदी से काम कर रहा है।

🧒 नन्हे छात्रों की कक्षाएं

इस प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने वाले दो नन्हे छात्र प्रीति कुमारी (कक्षा 4) और अर्जुन कुमार (कक्षा 1) हैं। पूरे स्कूल में सिर्फ यही दो बच्चे हैं जो हर दिन स्कूल आते हैं। इन दोनों बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए दो शिक्षक रोजाना समय पर स्कूल पहुंचते हैं और बकायदा क्लास लेते हैं।

🍲 नियमों का पालन और मिड-डे मील की व्यवस्था

भले ही स्कूल में बच्चों की संख्या न के बराबर हो, लेकिन सरकारी नियमों का पालन यहां शत-प्रतिशत हो रहा है। स्कूल के रजिस्टर में प्रतिदिन दोनों बच्चों की उपस्थिति दर्ज की जाती है और शिक्षकों की हाजिरी भी नियमित रूप से लगती है। सरकार की मिड-डे मील योजना के तहत इन दोनों बच्चों के लिए प्रतिदिन स्कूल में ताजा और पौष्टिक भोजन पकाया जाता है। यानी दो बच्चों के लिए रसोइया भी अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभा रहा है।

❓ व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल?

जब मीडिया ने वहां मौजूद शिक्षकों से इस बारे में सवाल पूछे, तो उन्होंने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया। यह स्थिति राज्य की शिक्षा व्यवस्था और बजट के उपयोग पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। एक तरफ सरकार बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए करोड़ों खर्च कर रही है, वहीं राजधानी के एक स्कूल से बच्चों और अभिभावकों का मोहभंग होना चिंताजनक है।

🔍 स्कूल खाली होने की असली वजह

पड़ताल में सामने आया कि यह एक प्राथमिक विद्यालय है, जहां केवल पांचवीं कक्षा तक ही पढ़ाई की सुविधा है। थड़पखना के आसपास कई अन्य सरकारी और निजी स्कूल मौजूद हैं, जहां 12वीं तक की पढ़ाई की निरंतर व्यवस्था है। अभिभावकों का मानना है कि बार-बार स्कूल बदलने के झंझट से बचने के लिए बच्चों का दाखिला सीधे उन स्कूलों में कराना बेहतर है जहां आगे की पढ़ाई भी हो सके। यही कारण है कि स्थानीय लोगों ने इस स्कूल के बजाय अन्य बड़े स्कूलों को चुना, जिससे यह स्कूल खाली हो गया।