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Transgender Persons Amendment Act 2026: सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट्स में चल रही कार्यवाही पर लगाई रोक; जानें क्या है मामला

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट एक्ट 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने राजस्थान, कर्नाटक, केरल और दिल्ली हाई कोर्ट में चल रही सभी संबंधित कार्यवाहियों पर रोक लगा दी है। अब इन सभी मामलों को एक साथ या किसी एक स्थान पर सुनने की प्रक्रिया पर विचार किया जा रहा है।

🏛️ एक साथ सुनवाई की तैयारी

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने स्पष्ट किया कि अलग-अलग हाई कोर्ट्स में अलग-अलग राय लेने के बजाय, इन सभी मामलों पर एक साथ विचार करना अधिक उचित होगा। अदालत ने संकेत दिया है कि या तो इन सभी याचिकाओं को किसी एक हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया जाएगा, या फिर सुप्रीम कोर्ट स्वयं इस पर अंतिम निर्णय ले सकता है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसे तीन जजों की बेंच के समक्ष रखने का सुझाव दिया।

🩺 “संशोधन का कोई मेडिकल आधार नहीं”

याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे वकीलों और डॉ. चंद्रेश जैन ने तर्क दिया कि 2026 का यह संशोधन 2014 के ऐतिहासिक NALSA फैसले को कमजोर करता है। उन्होंने दावा किया कि जेंडर की स्वयं पहचान करना एक मौलिक अधिकार है, और नया संशोधन न केवल असंवैधानिक है, बल्कि इसका कोई ठोस मेडिकल आधार भी नहीं है। याचिकाकर्ताओं का मानना है कि यह कानून ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों के विपरीत है।

🔍 NALSA बनाम संशोधन कानून

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को अवगत कराया कि केंद्र सरकार के कानून की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का मुख्य मुद्दा यह है कि 2014 के NALSA फैसले में जेंडर पहचान को लेकर जो अधिकार दिए गए थे, नया संशोधन उन पर अंकुश लगाता है। अब सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह कानून मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों के दायरे में आता है या नहीं।