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Housewife’s Contribution to Economy: गृहिणियों का योगदान राष्ट्र निर्माण में कितना? जानें क्यों जरूरी है उनके श्रम का आर्थिक मूल्य

भोपाल: सुबह की पहली चाय से लेकर रात के अंतिम काम तक, करोड़ों भारतीय गृहिणियां बिना किसी वेतन या छुट्टी के घर का प्रबंधन करती हैं। खाना बनाना, बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल और परिवार का भावनात्मक संबल बनना—ये वे कार्य हैं जिन पर पूरे समाज और परिवार की नींव टिकी है। इसके बावजूद, आधिकारिक आर्थिक गणनाओं में उनका यह श्रम आज भी ‘अदृश्य’ है।

📊 जीडीपी में गृहिणियों का योगदान क्यों नहीं दिखता?

सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का वर्तमान मॉडल केवल उन आर्थिक गतिविधियों को मापता है जिनमें मौद्रिक लेन-देन होता है। यदि कोई महिला घर पर भोजन बनाती है, तो वह जीडीपी में नहीं जुड़ता, लेकिन वही कार्य रेस्टोरेंट में होने पर आर्थिक गतिविधि बन जाता है। विकास विशेषज्ञ डॉ. विकास सिंह के अनुसार, भारत का विकास मॉडल महिलाओं द्वारा दिए जा रहे इसी मुफ्त श्रम पर आधारित है। एक रिपोर्ट के अनुसार, गृहिणियों के इस श्रम का आर्थिक मूल्य भारत की जीडीपी का लगभग 15 से 17 प्रतिशत तक हो सकता है।

⚖️ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और गृहिणियों का सम्मान

हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने गृहिणियों को ‘राष्ट्रनिर्माता’ बताते हुए उनके श्रम को आर्थिक मूल्य देने की आवश्यकता पर जोर दिया है। यह टिप्पणी केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक नीति निर्माण की दिशा में एक बड़ा कदम है। न्यायालय की यह सोच भविष्य में गृहिणियों के लिए पेंशन, स्वास्थ्य बीमा और सामाजिक सुरक्षा जैसे नए रास्ते खोल सकती है।

🌍 वैश्विक अनुभव: अन्य देशों ने कैसे दी मान्यता?

दुनिया के कई देशों ने घरेलू श्रम के मूल्य को समझा है:

  • स्वीडन: परिवार की देखभाल में बिताए वर्षों के आधार पर महिलाओं को ‘पेंशन क्रेडिट’ दिया जाता है।

  • कनाडा: नियमित टाइम-यूज सर्वे के जरिए घरेलू श्रम का आकलन किया जाता है और इन आंकड़ों का उपयोग सार्वजनिक नीतियां बनाने में होता है। भारत भी इन मॉडल्स से सीख लेकर अपनी महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा और सम्मान प्रदान करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

🔍 घरेलू श्रम के तीन प्रमुख स्तंभ

गृहिणियों का योगदान किसी पेशेवर सेवा से कम नहीं है:

  • भोजन और पोषण: परिवार की स्वास्थ्य व्यवस्था संभालना।

  • देखभाल: बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य व शिक्षा की नींव रखना।

  • घर का प्रबंधन: बजट, समय और दैनिक संसाधनों का कुशल संचालन। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इन सेवाओं के लिए पेशेवर कर्मचारी रखे जाएं, तो प्रति परिवार कम से कम 15,000 रुपये प्रतिमाह का खर्च आएगा।