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Bhopal Gas Tragedy: गैस पीड़ितों के मुफ्त इलाज पर सुप्रीम कोर्ट की समिति सख्त, विभाग को दिए कड़े निर्देश

भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के मुफ्त इलाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। समिति ने गैस राहत विभाग को कड़े निर्देश देते हुए स्पष्ट किया है कि पीड़ितों के अस्पताल के इलाज का पूरा खर्च विभाग को ही उठाना होगा। कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद, आयुष्मान योजना की सीमाओं और फंड की तय सीमा (सीलिंग) के कारण पीड़ित इलाज के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं, जो कि एक गंभीर मानवीय संकट की ओर इशारा करता है।

⚖️ कोर्ट के आदेशों की अनदेखी और आयुष्मान योजना की विफलता

निगरानी समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी.के. अग्रवाल ने मुख्य सचिव को पत्र लिखकर याद दिलाया है कि सुप्रीम कोर्ट और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट कई बार कह चुके हैं कि सभी गैस पीड़ितों का मुफ्त इलाज सुनिश्चित करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। वर्तमान में, गैस राहत विभाग किडनी ट्रांसप्लांट जैसे बड़े इलाजों के लिए आयुष्मान योजना के तहत अधिकतम 4 लाख रुपये की राशि मंजूर कर रहा है, जबकि निजी अस्पतालों में इसका न्यूनतम खर्च 6.5 लाख रुपये या उससे अधिक है। समिति के सदस्य पूर्णेन्दु शुक्ला का कहना है कि गैस पीड़ित एक विशेष श्रेणी में आते हैं और उन्हें बिना किसी ऊपरी सीमा (सीलिंग) के इलाज की पूरी राशि मिलनी चाहिए।

💊 निलोफर का मामला: किडनी ट्रांसप्लांट के लिए पैसों की तंगी

इस त्रासदी की गंभीरता को एक 42 वर्षीय गैस पीड़ित महिला, निलोफर के मामले से समझा जा सकता है। वह लंबे समय से किडनी ट्रांसप्लांट के लिए सरकारी सहायता का इंतजार कर रही हैं। निजी अस्पताल ने इस इलाज का एस्टीमेट 6.5 लाख रुपये दिया है, लेकिन विभाग ने केवल 4 लाख रुपये ही मंजूर किए हैं। निलोफर की माँ अपनी एक किडनी देने के लिए तैयार हैं, लेकिन शेष 2.5 लाख रुपये की व्यवस्था न हो पाने के कारण इलाज अधर में लटका हुआ है, जिससे महिला का जीवन खतरे में है।

⚠️ एनजीओ की चेतावनी: कोर्ट की अवमानना का खतरा

‘भोपाल ग्रुप फॉर इंफॉर्मेशन एंड एक्शन’ की सह-संयोजक रचना ढींगरा ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने चेतावनी दी है कि गैस पीड़ितों को मुफ्त इलाज न देना सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन है। उन्होंने मुख्य सचिव को चेतावनी दी है कि यदि तुरंत सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो वे अदालत में अवमानना याचिका दायर करेंगी। ढींगरा ने समिति को ऐसे तीन और मामलों की सूची सौंपी है, जहाँ मरीजों को आर्थिक तंगी के कारण मजबूरन खुद पैसों का इंतजाम करना पड़ा।

📑 गैस राहत विभाग का पक्ष: नियमों में बदलाव की तैयारी

मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए गैस राहत विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया कि 4 लाख रुपये की वर्तमान सीमा अब अपर्याप्त हो गई है। हालांकि, उन्होंने आश्वस्त किया है कि हाल ही में सामने आई शिकायतों को देखते हुए विभाग अब इस नीति को बदलने और इलाज की सीमा को बढ़ाने पर गंभीरता से काम कर रहा है। पीड़ितों को उम्मीद है कि प्रशासन जल्द से जल्द इन नियमों में राहत प्रदान करेगा ताकि किसी की जान इलाज के अभाव में न जाए।