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जम्मू-कश्मीर विधानसभा: किस बिल के विरोध में छलका विधायक का दर्द? बेटे की याद में सदन के भीतर हुए इमोशनल

सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक सैयद बशीर अहमद वीरी बुधवार को जम्मू-कश्मीर विधानसभा में भावुक हो गए. उन्होंने अपने साधी विधायकों और अपनी ही पार्टी की सरकार से गुहार लगाई कि उन्हें जम्मू और कश्मीर आरक्षण अधिनियम, 2004 में संशोधन करने वाला अपना बिल पेश करने की अनुमति दी जाए. सरकार की तरफ से बिल पेश किए जाने का विरोध किए जाने के बाद वीरी ने भावुक होकर सदन से कहा कि मैं किसी को चुनौती नहीं दे रहा हूं. मैं उन बच्चों की बात कर रहा हूं जो हमारी, मेरे नेता की और इस सदन की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं.

सैयद बशीर ने कहा कि मैं पिछले तीन दिनों से सो नहीं पाया हूं. मेरा इकलौता बेटा लंदन चला गया है. उसने मुझसे कहा है कि पापा, मैं अब वापस नहीं आऊंगा, क्योंकि हमारे लिए यहां आगे बढ़ने के कोई मौके ही नहीं हैं. वीरी ने बताया कि उनके चुनाव क्षेत्र के जिन बच्चों ने चुनाव के दौरान उनके लिए काम किया था, उन्होंने उन्हें फोन किया था.

‘मुझे खरी-खोटी सुननी पड़ी है’

वीरी ने बताया कि उन बच्चों को भरोसा दिलाया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह उनकी चिंताओं को पूरी मजबूती से सदन में उठाएंगे. उन्होंने कहा कि जब वे सोनवार या बुलेवार्ड में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मिलने आए थे, तो मैंने उनसे कहा था कि मैं अपने नेता के सामने खड़ा होकर उनका विरोध नहीं कर सकता. सैयद बशीर अहमद ने कहा कि मैंने उनसे कहा था कि उनकी आवाज उठाने का मेरे पास एक दूसरा तरीका है. और इसी सोच के साथ मैंने यह बिल तैयार किया. उन्होंने कहा कि तब से लेकर अब तक, यानी डेढ़ साल के इस लंबे अरसे में, मुझे न जाने कितनी तरह की खरी-खोटी सुननी पड़ी है.

‘कम से कम 50 प्रतिशत की सीमा को ही लागू करें’

वीरी ने सदन के सदस्यों से अपील की कि उन्हें अपना बिल पेश करने की अनुमति दी जाए. उन्होंने कहा कि आपके पास इसके लिए उचित प्रक्रियाएं मौजूद हैं. आप चाहें तो इसे किसी ‘चयन समिति’ (Select Committee) के पास भेज सकते हैं, जहां भी आप उचित समझें, वहां भेज सकते हैं. उन्होंने यह भी जोड़ा कि चाहे कोई भी व्यवस्था की जाए, इस बात की पूरी संभावना है कि यह बिल आखिर में निष्प्रभावी ही साबित हो.

सैयद बशीर ने कहा कि भगवान के वास्ते और मेरे बच्चों के भविष्य के लिए, मैं यह मांग करता हूं कि ‘ओपन मेरिट’ (सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों) के लिए 65 प्रतिशत आरक्षण (सरकारी नौकरियों में रिक्तियों और पेशेवर संस्थानों में सीटों के रूप में) निर्धारित किया जाएं. यदि 65 प्रतिशत संभव न हो, तो कम से कम ‘इंदिरा साहनी मामले’ में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तय किए गए 50 प्रतिशत की सीमा को ही लागू करने की अनुमति दी जाए.

उन्होंने सदन से आग्रह किया कि मौजूदा आरक्षण नियमों के ‘नियम 17’ में संशोधन किया जाए और ‘क्षैतिज आरक्षण’ (Horizontal Reservation) की व्यवस्था को ज्यादा तर्कसंगत बनाया जाए. उन्होंने ‘आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग’ (EWS), ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ (ALC) के निकट रहने वाले लोगों, और ‘पिछड़े क्षेत्रों के निवासियों’ (RBA) जैसी श्रेणियों के बीच मौजूद विसंगतियों का हवाला देते हुए यह मांग की.