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इंदौर मेट्रो पर बड़ा ‘ब्रेक’! बिना जरूरी NOC के कैसे शुरू हुआ ट्रायल रन? सरकारी विभागों के नियमों की अनदेखी पर उठे गंभीर सवाल

इंदौर : मध्य प्रदेश की सबसे महत्वाकांक्षी मेट्रो रेल परियोजना का काम शासन की बिना अनुमति के ही चल रहा है. यह खुलासा इंदौर हाई कोर्ट में दायर की गई याचिका के दौरान हुआ. चौंकाने वाली बात यह है कि इंदौर हाई कोर्ट भी बीते 15 महीने से इंदौर मेट्रो के निर्माण की जरूरी अनुमतियों और स्वीकृतियों के इंतजार में है. मेट्रो रेल प्रबंधन की ओर से मंगलवार को हुई सुनवाई मे भी कोई अनुमति और जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया. अब हाई कोर्ट ने 15 दिन की मोहलत फिर से दी है.

मेट्रो के दूसरे चरण से पहले पेच फंसा

इंदौर में मेट्रो रेल परियोजना के दूसरे चरण से पहले प्रोजेक्ट को अनुमतियां नहीं मिलना चर्चा का विषय है. इंदौर के बीचोंबीच 34 किलोमीटर के व्यस्ततम इलाकों में मेट्रो को चलाने की अधूरी और मनमानी प्लानिंग के कारण व्हिसिल ब्लोअर किशोर कोडवानी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की.

इसमें मेट्रो के इंदौर शहर में निर्माण के लिए जरूरी ठहराव प्रस्ताव की रिपोर्ट के अलावा, मेट्रो को अंडरग्राउंड चलाने की स्थिति में भारत शासन के अधीन एनवायरमेंट इंपैक्ट कमेटी की रिपोर्ट और पुरातात्विक धरोहरों के आसपास से गुजारने के लिये जरूरी हेरिटेज एक्ट के तहत एनओसी और मेट्रो की स्टेटस रिपोर्ट मांगी गई.

शासन स्तर से ही वैधानिक अनुमति नहीं

याचिका की सुनवाई के दौरान पता चला कि मेट्रो रेल प्रोजेक्ट को अब तक शासन स्तर पर वैधानिक अनुमति नहीं मिली है. हाई कोर्ट ने राज्य शासन और मेट्रो रेल कारपोरेशन के अधिकारियों से इस मामले में जवाब मांगा था, जिस पर 17 मार्च को इंदौर हाई कोर्ट में सुनवाई हुई. इस दौरान पता चला कि इस बार भी शासन स्तर पर मेट्रो के संबंध में कोई जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया. कोर्ट ने अब अगले 15 दिन में नगरी प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव को जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं.

मेट्रो के स्टॉपेज का प्रस्ताव किसने दिया

व्हिसिल ब्लोअर किशोर कोडवानी के मुताबिक “इस प्रोजेक्ट को इंदौर में शुरू करने के लिए सबसे पहले जिला योजना समिति की ओर से ठहराव प्रस्ताव के बाद सहमति दी जानी थी, लेकिन बीते 7 सालों से इंदौर में जिला योजना समिति का गठन ही नहीं हुआ तो फिर ठहराव प्रस्ताव किसने दिया?

मेट्रो को भूमिगत ले जाने की स्थिति में जरूरी पर्यावरण मंत्रालय के अधीन एनवायरमेंट इंपैक्ट कमेटी की सहमति ले जानी थी, जो अब तक नहीं ली गई. इसके अलावा भूमिगत ट्रेन किन क्षेत्रों में जाएगी और वहां अधिग्रहण कैसे होगा, इसका कोई जिक्र हाई कोर्ट में पेश जवाब नहीं किया गया.

हेरिटेज एक्ट के तहत अनुमति नहीं ली

मेट्रो रेल कॉरपोरेशन द्वारा शहर के पुरातात्विक क्षेत्र में निर्माण के लिए जरूरी हेरिटेज एक्ट के तहत राष्ट्रपति कार्यालय से अनुमति भी नहीं ली गई, न ही इस आशय का अब तक कोई बजट नोटिफिकेशन ही हुआ है. इस एक्ट का उल्लंघन करने पर 7 साल की सजा और 2 लख रुपए के जमाने का प्रावधान है.

प्रोजेक्ट की स्टेटस रिपोर्ट में किन-किन इलाकों में मेट्रो चलेगी, अधिग्रहण किन-किन इलाकों का कितना होगा, इसका बजट कितना है, कहां से पैसा आएगा और रूट निर्धारण का आधार क्या है, ये भी सवाल हैं.