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Abujhmad Transformation: नक्सलवाद के साये से बाहर आ रहा अबूझमाड़, झारावाही में ग्रामीणों ने शुरू किया पारंपरिक घोटूल निर्माण; जानें क्या है इसकी अहमियत

नारायणपुर: बस्तर के सुदूर और लंबे समय तक नक्सल प्रभाव से घिरे रहे अबूझमाड़ में अब बदलाव की नई तस्वीर उभर रही है. जैसे-जैसे नक्सलवाद का प्रभाव इस क्षेत्र से सिमटता जा रहा है, वैसे-वैसे यहां के ग्रामीण अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं को फिर से जीवित करने की कोशिशों में जुट गए हैं.

नारायणपुर जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर घोर नक्सल प्रभावित रहे ग्राम झारावाही से ऐसी ही एक प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है, जहां ग्रामीण बिना किसी सरकारी सहायता के केवल आपसी सहयोग और श्रमदान से पारंपरिक घोटूल का निर्माण कर रहे हैं.

श्रमदान से बन रहा पारंपरिक घोटूल

घोटूल आदिवासी समाज के लिए केवल एक भवन नहीं बल्कि उनकी संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक जीवन का केंद्र माना जाता है. यही वजह है कि ग्राम झारावाही के ग्रामीणों ने अपनी पारंपरिक संस्कृति को सहेजने के लिए घोटूल निर्माण की शुरुआत की है. ग्रामीण खुद जंगल से मिलने वाली सामग्री और गिरे हुए मजबूत पेड़ों की लकड़ियों का उपयोग कर पारंपरिक शैली में घोटूल तैयार कर रहे हैं.

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि वर्षों पहले जब यह गांव बसाया गया था, तब यहां एक भव्य घोटूल मौजूद था. यह घोटूल आसपास के इलाकों में अपनी समृद्ध परंपरा के लिए प्रसिद्ध था. उस समय यहां के युवाओं की नृत्य और गायन कला की दूर-दूर तक चर्चा होती थी.

नक्सलवाद के दौर में कमजोर पड़ी परंपरा

ग्रामीणों ने बताया कि नब्बे के दशक में जब अबूझमाड़ क्षेत्र में नक्सलवाद ने अपनी जड़ें जमानी शुरू कीं, तब गांव के युवाओं का रुझान धीरे-धीरे माओवादी विचारधारा की ओर बढ़ने लगा. इसका असर यह हुआ कि पारंपरिक आदिवासी सांस्कृतिक केंद्र रहे घोटूल की गतिविधियां धीरे-धीरे कम होने लगीं और यह परंपरा लगभग समाप्ति की कगार पर पहुंच गई.कुछ आयोजन जरूर होते थे, लेकिन उनमें आदिवासी संस्कृति की झलक कम और माओवादी विचारों का प्रभाव ज्यादा दिखाई देने लगा था.

समय के साथ स्थिति इतनी बदल गई कि घोटूल, जो कभी गांव के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का केंद्र हुआ करता था, लगभग बंद होने की स्थिति में पहुंच गया- ग्रामीण

अब फिर जीवित हो रही सांस्कृतिक परंपरा

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में नक्सल प्रभाव के कमजोर पड़ने के बाद अबूझमाड़ में सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां फिर से शुरू होने लगी हैं. ग्राम झारावाही के ग्रामीणों ने इसी बदलाव को आगे बढ़ाते हुए अपने पारंपरिक घोटूल का पुनर्निर्माण शुरू किया है. ग्रामीणों का कहना है कि फिलहाल वे अपने सामर्थ्य के अनुसार जंगल से मिलने वाली सामग्री से घोटूल तैयार कर रहे हैं. ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और कलेक्टर से भी मदद की उम्मीद जताई है.

यदि प्रशासन की ओर से आर्थिक सहायता मिल जाए तो इसकी छत को घास-फूस के बजाय सीमेंट या टीन की शीट से मजबूत बना सकते हैं, जिससे यह भवन लंबे समय तक सुरक्षित रह सके- ग्रामीण

आदिवासी समाज में घोटूल का महत्व

अबूझमाड़ और बस्तर क्षेत्र के आदिवासी समाज में घोटूल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है. यह केवल एक सामुदायिक भवन नहीं बल्कि आदिवासी संस्कृति की जीवित पाठशाला होता है, क्योंकि आदिवासी समाज का इतिहास लंबे समय तक लिखित रूप में संरक्षित नहीं रहा, इसलिए घोटूल ही वह स्थान रहा है, जहां बुजुर्ग अपनी परंपराएं, रीति-रिवाज, सांस्कृतिक ज्ञान और जीवन के अनुभव युवाओं के साथ साझा करते रहे हैं.घोटूल के माध्यम से यह ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता है.

सामाजिक जीवन का केंद्र

घोटूल केवल सांस्कृतिक गतिविधियों का स्थल नहीं बल्कि गांव के सामाजिक जीवन का भी केंद्र होता है. यहां युवा नृत्य, गीत और मनोरंजन के माध्यम से अपनी कला को विकसित करते हैं. उन्हें सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों की शिक्षा भी दी जाती है.

कई गांवों में घोटूल को ग्रामीण न्याय व्यवस्था के रूप में भी देखा जाता है. गांव में होने वाले छोटे-मोटे विवादों का समाधान भी अक्सर यहीं बैठकर किया जाता है. तीज-त्योहार, विवाह, जन्म और मृत्यु जैसे सामाजिक आयोजनों की योजना बनाने में भी घोटूल की अहम भूमिका होती है. गांव के लोग यहीं बैठकर सामूहिक निर्णय लेते हैं और फिर उन्हें पूरे गांव तक पहुंचाया जाता है.

प्रशासन से उम्मीद

ग्राम झारावाही के ग्रामीणों ने अपने सामर्थ्य से घोटूल निर्माण की नींव तो रख दी है, लेकिन अब वे चाहते हैं कि जिला प्रशासन भी इस पहल में उनका सहयोग करे.

यदि प्रशासन की ओर से थोड़ी आर्थिक सहायता मिल जाए तो घोटूल को अधिक मजबूत और टिकाऊ बनाया जा सकता है, जिससे यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रह सके-ग्रामीण

विरासत को पुनर्जीवित करने का प्रयास

ग्राम झारावाही में ग्रामीणों द्वारा श्रमदान से शुरू किया गया घोटूल निर्माण इस बात का संकेत है कि अब यहां के लोग फिर से अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं. यह पहल केवल एक भवन निर्माण नहीं बल्कि उस सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने का प्रयास है, जो सदियों से आदिवासी समाज की पहचान रही है. अगर प्रशासन और समाज का सहयोग मिला तो यह घोटूल न केवल झारावाही बल्कि पूरे अबूझमाड़ क्षेत्र में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बन सकता है.

ग्रामीणों में नया आत्मविश्वास

नक्सलवाद के प्रभाव में रहा अबूझमाड़ लंबे समय तक विकास और सांस्कृतिक गतिविधियों से लगभग कट चुका था. गांवों में सामुदायिक परंपराओं का स्वरूप भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा था. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने और नक्सल प्रभाव कम होने के बाद अब यहां के ग्रामीणों में नया आत्मविश्वास दिखाई देने लगा है. यही वजह है कि वे अब अपनी पुरातन परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को फिर से जीवित करने के प्रयास कर रहे हैं. इसी बदलाव की मिसाल नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र के ग्राम झारावाही में देखने को मिल रही है.